चकिया। अनियंत्रित विकास के तहत प्राकृतिक संसाधनों का निर्बाध दोहन जैव विविधता के विभिन्न आयामों पर भारी पड़ रहा है। जिससे वृक्षों, वनस्पतियों, वन्यजीवों, पक्षियों और सूक्ष्मजीवों की तमाम प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं या विलुप्तता की ओर अग्रसर हो रही हैं। इसलिए जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण के प्रति बच्चों में संस्कार विकसित करने की जरूरत है। उक्त विचार काशी वन्य जीव प्रभाग के चंद्रप्रभा रेंज के तत्वावधान में स्थानीय वनविश्राम गृह (दिलकुशा) में अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता संरक्षण दिवस के अवसर पर गुरुवार को आयोजित संगोष्ठी में विचार व्यक्त करते हुए मुख्य अतिथि तहसीलदार संजय कुमार सिंह ने व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति निष्ठा और ईमानदारी से अपने कर्तव्यों के निर्वहन से पुन: पर्यावरणीय स्थिति प्राप्त की जा सकती है। संगोष्ठी में वृक्ष बंधु पुरस्कार से सम्मानित परशुराम सिंह ने कहा कि प्राचीन भारत के जीवों और मानवों के बीच सहअस्तित्व की परिकल्पना थी। जिसके चलते भारत को विश्व गुरु कहा गया। भगवान राम जैसे आदर्श पुरुष ने वनों को अपने कदमों से नापकर यह साहचर्य स्थापित किया था। वर्तमान दौर की विसंगतियों को दर किनार कर हमें पुन: उसी युग की ओर लौटने की जरूरत है।
सावित्री बाई फुले राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य डा. रामसूरत ने कहा कि नेचुरल सफाईकर्मी और गौरैया की विलुप्तता मानव को संदेश दे रही है कि उनके अस्तित्व को बचाने के लिए मानव को आगे आना होगा। सीआरपीएफ के डिप्टी कमांडेंट विशिष्ट अतिथि गणेश प्रताप सिंह ने कहा कि काशी के वनों का पर्यावरण अत्यंत समृद्धशाली है, इसलिए यहां के लोगों का कर्तव्य है कि इस समृद्ध पर्यावरण और इसमेें निवास करने वाले वन्य जीवों की सुरक्षा करें। इसके पूर्व विषय स्थापना करते हुए चंद्रप्रभा रेंजर आरएस शुक्ला ने जैव विविधता के विभिन्न घटकों का निरूपण किया। चंद्रप्रभा कृषि विकास समिति के कपिल देव सिंह ने गिद्ध और गौरैया की विलुप्तता के सहारे कृषि क्षेत्र के उपयोगी सूक्ष्म जीवों के नष्ट होने पर विस्तृत प्रकाश डाला। संगोष्ठी में चकिया रेंजर एसपी श्रीवास्तव, राजपथ रेंजर नंदलाल मौर्या, बलवंत बिंद, चंद्रप्रभा कृषि विकास समिति के अध्यक्ष संतराम पांडेय और तनिष्क चौहान ने विचार व्यक्त किए। संगोष्ठी में लोकगीत गायक रमाशंकर प्रतापी ने पर्यावरण गीत प्रस्तुत कर उपस्थित लोगों को जैव विविधता संरक्षण की दिशा में प्रेरित किया। संगोष्ठी की अध्यक्षता प्राचार्य डा. रामसूरत एवं संचालन मुहम्मद नईम ने किया।