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श्रीमद्भागवत मुक्ति का सोपान ग्रंथ और सत्संग है प्रयोगशाला

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श्रीमद्भागवत कथा से संस्कार का विकास होता है
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कथा के प्रथम दिन बोले आचार्य अवनीश जी महाराज
सचित्र-
अमर उजाला ब्यूरो
कंदवा। श्रीमद्भागवत मुक्ति का सोपान ग्रंथ और सत्संग प्रयोगशाला है। इसमें मनुष्य में संस्कार का विकास होता है। जिस प्रकार से कच्चे ईंट को भट्ठे के माध्यम से परिपक्व किया जाता है, उसी प्रकार मनुष्यों को भागवत कथा के माध्यम से सच्चा मानव बनने की शिक्षा दी जाती है।
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उक्त बातें अमड़ा गांव स्थित शिव मंदिर परिसर में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के पहले दिन सोमवार को वृंदावन से पधारे आचार्य अवनीश जी महाराज ने कहीं। कहा कि वैसे तो शरीर से सब मनुष्य हैं, परंतु विचारों से उनके अंदर राक्षसी प्रवृत्ति आ गई है। यह राक्षसी प्रवृत्ति सत्संग और शास्त्र के माध्यम से ही दूर हो सकती है। कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि शिव-पार्वती, याज्ञवलक्य, काक भूषंडी, परीक्षित जैसे लोगों को भी शास्त्र व सत्संग की आवश्यकता पड़ी। आज के मानव यदि सत्संग से दूर रहें तो निश्चित ही उनमें आसुरी प्रवृत्ति जागृत हो जाएगी और वे पतित व भ्रष्ट हो जाएंगे। उन्होंने धुंधकारी का उदाहरण देते हुए कहा कि धुंधकारी सत्संग व शास्त्र से दूर रहा जिसकी वजह से वह राक्षसी कर्मों में लिप्त हो गया। अगर मानव को अपना लोक और परलोक संवारना है तो उसे शास्त्रों की देखरेख में सत्संगमय जीवन व्यतीत करना चाहिए। कथा श्रवण करने वालों में अनिल सिंह, यशवंत पाठक, शिवबचन सिंह, संजय सिंह, बलराम पाठक, शिवकांत सिंह, बलवीर सिंह, अर्जुन सिंह, राजू सिंह, अंशुमान, छाया, रीमा, गीता, विनोद सिंह, लीलावती, रमावती, शशि, अशोक, मृत्युंजय शामिल रहे।
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