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आदिवासियों को पहचान दिलाने से घबराता है आरएसएस

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नौगढ़। आरएसएस की हिंदुत्व की राजनीति से आदिवासी और वनाश्रित सावधान रहें। आरएसएस आदिवासी को आदिवासी नहीं कहता क्योंकि आदिवासी को पहचान देते ही उसकी हिंदुत्व की राजनीति का माडल और सिद्धांत ध्वस्त हो जाता है। आरएसएस का राजनीतिक माडल कारपोरेट जगत की सेवा के लिए है।
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ये बातें नौगढ़ में आयोजित जमीन अधिकार आंदोलन के तहत वनाधिकार सम्मेलन में जनमंच के संयोजक व पुलिस के पूर्व आईजी एसआर दारापुरी ने कहीं। कहा कि आरएसएस और इसके राजनीतिक संगठन भाजपा की ताकत बढ़ने का मतलब आदिवासियों व वनवासियों की बड़े पैमाने पर तबाही है। जहां-जहां इनकी सरकारें हैं वहां आदिवासियों की बेदखली, उनका उत्पीड़न और हत्याएं हो रही हैं। उन्होंने संघ व प्रशासन के दमन के विरूद्ध प्रतिकार अभियान चलाने की बात कही। कहा कि जनपद का भविष्य लोकतांत्रिक राजनीति में ही है। नौगढ़, चकिया व शहाबगंज के कई गांवों में हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी आदिवासियों व वनवासियों को वन विभाग बेदखल कर रहा है। चेतावनी दी कि उत्पीड़न पर रोक नहीं लगी तो हाईकोर्ट में अवमानना का मुकदमा दर्ज कराया जाएगा। दिनकर कपुर ने कहा कि वनाधिकार कानून के अनुपालन के लिए सड़क से न्यायालय तक लड़ाई लड़ी जाएगी। सम्मेलन में मजदूर किसान मंच के प्रभारी अजय राय, रामनारायण, गंगा चेरो, अमेरिका निषाद, बचाऊ राम, गीता राय, रहीमुदीन, रामेश्वर ने उपस्थित थे। अध्यक्षता राममूरत पासवान व संचालन रामेश्वर प्रसाद ने किया।
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