चकिया। बिगड़ते पर्यावरण के चलते कम बारिश और अंधाधुंध कृषि क्षेत्र एवं पेयजल के लिए भूमिगत जल के अंधाधुंध दोहन से पर्वतीय वन क्षेत्रों सहित मैदानी क्षेत्रों में भूमिगत जलस्तर लगातार साल-दर-साल गिरता जा रहा है। वहीं टूटी पेयजल पाइपें, सरकारी नलों और स्टेशन पर खुले नल से गिरता पानी भी बर्बादी का बड़ा कारण है। जली संचयन के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग की कवायद सरकारी स्तर पर तो की जाती है लेकिन प्रचार-प्रसार के अभाव और कड़ाई से इसका पालन न होने से घरों की छतों का बरसाती पानी जहां-तहां बहकर बर्बाद हो जाता है। केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पर्वतीय वन क्षेत्र में डेढ़ से तीन मीटर और मैदानी क्षेत्र में एक से डेढ़ मीटर प्रति वर्ष भूजल नीचे जा रहा है।
केंद्रीय जल आयोग के वर्ष 2015 में जारी रिपोर्ट के अनुसार अपेक्षित बरसात न होने तथा सबमर्सिबल पंपों द्वारा कृषि क्षेत्र एवं पेयजल के लिए भूगर्भीय जल के प्रयोग से साल-दर-साल भूजल स्तर में गिरावट हो रही है। वहीं राष्ट्रीय गंगा बेसिन नदी प्राधिकरण की रिपोर्ट में भी इसी तरह के दावे किए गए हैं। जिले के दक्षिणी हिस्सो में पिछले वर्ष को छोडकर पिछले 10 वर्षों में बरसात ने जिले में वर्ष 2000 के पूर्व तक औसत बरसात का आकड़ा 1050 मिलीमीटर के आस पास नही पहुंच सका है। वर्ष 2000, 2005 तथा 2017 में हुई बरसातों ने ही औसत बरसात के आकड़े के आस-पास का आकड़ा छुआ है। शेष वर्षो में यह आकड़ा 500 मिलीमीटर से 600 मिलीमीटर के बीच ही सिमटा रहा है। हालत यह है कि क्षेत्र में स्थित विशालकाय मूसाखाड़, चंद्रप्रभा तथा नौगढ़ जलाशयों मे गर्मी के पहले चरण मे मामूली पानी बचा है। वही जिले में स्थित 107 छोटी-बड़ी बंधियों में पानी नही है। क्षेत्र में स्थित मनरेगा के तहत खोदे गए तालाब व पर्वतीय नाले सूख गए हैं। कर्मनाशा, चंद्रप्रभा, गड़ई नदियों का अधिकांश पानी उचित प्रबंधन न होने के कारण गंगा में चला जाता है। वही शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रो में रेनवाटर हार्वेस्टिंग के प्रति भी जनता उदासीन है। चंद्रप्रभा प्रखंड के अधिशासी अभियंता जेपी वर्मा के अनुसार मानसून सत्र की विफलता के कारण भूमिगत जलस्तर रिचार्ज होने में दिक्कत आ रही है। चकिया ब्लाक के एडीओ एमआई आगाज खान ने कहा कि रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के प्रति लोगों का रूझान न होने से वर्षा जल के संरक्षण के उपाय नही हो रहे है।