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काव्य रंगोत्सव में कवियों ने लोगो का किया मनोरंजन

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चकिया। चंद्रप्रभा साहित्यिक संस्था के तत्वावधान में रविवार को श्री आदित्य पुस्तकालय परिसर में काव्य रंगोत्सव का आयोजन किया गया। जिसमें कविताओं के माध्यम से भ्रष्टाचार पर चोट किया।
रंगोत्सव काव्य गोष्ठी का शुभारंभ राजेश विश्वकर्मा राजू की वंदना से हुआ। सबसे पहले कवि तेजबली अनपढ़ ने माँ की ऐसी दर्द की कहानी सुनाऊं, के माध्यम से अपने विचार रखे। अलियार प्रधान ने तनिको बुझात नाही दरद, कइसन बाड़ा मरद सुनाया। वही संतोष कुमार पांडेय ने महुआ बिनन नाही जइबे हो रामा सुनाया। तो वसीम अहमद ने देशवा घोटाला-घोटाला बा सुनाकर देश में हो रहे भष्टाचार पर चोट किया ।
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इसके बाद आये कवि संतोष कुमार धूर्त ने पैरों के न छोड़ निशान सुनाया। तो राजेन्द्र प्रसाद भ्रमर ने जाके सास-श्वसुर प्रिय नाही सुनाकर समाज पर व्यंग्य किया। वहीं मनोज कुमार मधुर ने बहार आई है ऋतुराज का सुगंध लिये सुनाकर लोगों को मौसम से जोड़ा। तो ज्योति कुमार द्विवेदी ने चला अपने गांवें क होली देखाइब सुनाकर लोगों को होली की महिमा बताया वहीं बंधु पाल बंधु ने बाह रे नेता, बाह रे वोट सुनाकर राजनीति पर व्यंग्य किया। हरिवंश सिंह बवाल ने दानवता के हाथों में मानवता की चोली है, कैसे कह दूं की होली है, सुनाकर समाज की स्थिति को उजागर किया। तो राजेन्द्र प्रसाद गुप्त बावरा ने हाय-हाय रे होली सुनाया। वहीं बेचई सिंह मालिक ने आज होली है नव यौवना के साथ निष्ठुर ठिठोली है सुनाकर लोगों को खुश किया। इस अवसर पर डा. रामकिशोर शर्मा बेहद, प्रदीप कुमार पाठक एड., मदन प्रसाद गुप्त, राजेश बेनजीर ने भी काव्य पाठ किया। अध्यक्षता रामकिशोर शर्मा बेहद ने संचालन प्रदीप कुमार पाठक एड. ने किया।
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