प्रदेश के कई आला अफसर सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर पसोपेश में हैं।
उनमें यह असमंजस बना हुआ है कि अगर वह नियमों के मुताबिक काम करते हैं तो भी सजा के भागीदार बन सकते हैं और बगैर कुछ किए भी सजा पा सकते हैं।
ऐसे में उन्हें वह लाइन ऑफ एक्शन नहीं समझ में आ रहा है, जिस पर चलकर वह पूरी तरह सुरक्षित रहें। अफसरों में चर्चा आम है कि करें तो मरें और न करें तो मरें।
इसके कई उदाहरण हैं, जिनसे साबित हुआ है कि अपना काम करने पर भी अधिकारी दंडित हुए और ऐसे भी वाकये हैं, जिनमें दोष न होते हुए भी अफसर को निलंबन या अन्य किसी तरह की कार्रवाई का सामना करना पड़ा।
लखीमपुर खीरी की डीएम भी फंसी
जो वाकये सामने हैं उनमें कई महत्वपूर्ण पदों पर तैनात रह चुकीं लखीमपुर खीरी की डीएम मनीषा त्रिगटिया का मामला भी कुछ प्रमुख मामलों में शामिल किया जा सकता है।
मनीषा को कुछ दिनों पहले उनके पद से हटा दिया गया था। उन पर आरोप लगाया गया कि वह जिले में लेखपालों के भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा सकी थीं।
ऐसे ही नोएडा में प्रशिक्षु एसडीएम दुर्गा शक्ति नागपाल का मामला है। खनन माफिया से भिड़ना उन्हें भारी पड़ गया था। अवैध खनन की रोकथाम करने की कोशिश करने पर दुर्गा शक्ति को निलंबित कर दिया गया था।
गोंडा के कप्तान का मामला निराला
गोंडा के कप्तान नवनीत राणा का मामला तो और निराला है। राणा ने गोकशी के एक मामले में रिश्वत देने की कोशिश का स्टिंग ऑपरेशन किया था। यह ऑपरेशन उन्होंने एडीजी कानून-व्यवस्था के संज्ञान में लाने के बाद किया था।
इस पूरे मामले के पीछे राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त केसी पांडेय का नाम आया था। मामले में सरकार ने गोकशी रोकने की कोशिश करने वाले एसपी को ही हटा दिया था।
इसमें मुजफ्फरनगर के डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी का मामला भी खासा उल्लेखनीय है। इसमें सरकार को खासी असहज स्थिति का सामना करना पड़ा था।
मुजफ्फरनगर में जब सांप्रदायिक हिंसा नहीं फैली थी और कवाल गांव में दो लोगों समेत कुल तीन की हत्या हुई थी। उसी समय वहां के डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी को हटा दिया गया था।