12 से ज्यादा विधानसभा और लोकसभा चुनाव देख चुके मशहूर पर्यावरणविद को आज के इलेक्शन का माहौल नहीं भाता। सिद्धांतों पर आधारित राजनीति को मौकापरस्त होता देख उनका मन विचलित हो जाता है।
रिटायर्ड डीएफओ और मशहूर पर्यावरणविद राजेंद्र पथिक ने अपने जीवन में 12 से ज्यादा विधानसभा और लोकसभा चुनाव देखे हैं। पथिक बताते हैं कि 1957 से लेकर अब तक के दौर के चुनाव उन्होंने देखे हैं। उस दौर में चुनाव एक उत्सव की तरह होता था। चुनावी बिगुल बजते ही गांव-गांव चौपाल लगती थीं।
सिद्धांतों पर आधारित राजनीति होती थी, जो अब मौकापरस्त हो गई है। मतदाताओं में मतदान के प्रति उत्साह रहता था। पहले कम गांवों में ही बूथ बनते थे। मतदान के लिए ब्लॉक पर जाना पड़ता था। लोग भैंसा-बुग्गी, घोड़ा-बग्गी से ब्लॉक तक मतदान करने जाते थे। रास्ते में मलहार, गीत आदि गाए जाते थे।
सभी दलों के प्रत्याशी गांव में सभा कर अपने वादे और पिछले कार्य बताते थे। ईमानदारी से अपनी नाकामियां भी कबूल कर लेते थे। साफगोई से उनके लिए माफी मांग लेते थे, लेकिन फरेबी राजनीति नहीं करते थे। अब यह दौर बदल गया।
पथिक बताते हैं कि राजनीति के दौर में 1990 के बाद से गिरावट आती चली गई। राजनीति को समाज सेवा की जगह व्यवसाय मान लिया गया। झूठे वादे किए जाने लगे। राजनेता मौकापरस्त हो गए। जिस दल ने उन्हें सब कुछ दिया, मतलब पड़ने पर उसे धोखा देने लगे। राजनीति की ऐसी स्थिति देख उनका मन व्यथित होता है।