पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सियासी जमीन पर लोध मतदाता ही प्रत्याशियों का भविष्य तय करेंगे। आजादी के बाद से अधिकांश समय भाजपा-जनसंघ के पास रही इस सीट पर इस बार कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है। भाजपा और सपा-कांग्रेस ने जहां लोध प्रत्याशियों पर दांव खेला है तो वहीं बसपा ने ब्राह्मण चेहरे पर भरोसा दिखाया है।
पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह को उन्हीं के गढ़ में दो बार हराकर सुर्खियों में आए गुड्डू पंडित इस बार इस सीट से मैदान में नहीं हैं। भाजपा की तरफ से अनिता लोधी राजपूत को उम्मीदवार बनाया गया है तो सपा-कांग्रेस के गठबंधन प्रत्याशी के रूप में भी लोध प्रत्याशी हरीश लोधी पर दांव चला गया है।
इसके अलावा बसपा ने जहां एकमात्र ब्राह्मण प्रत्याशी देवेंद्र भारद्वाज को अपना उम्मीदवार बनाया है तो रालोद की तरफ से सत्यवीर यादव ताल ठाेंक रहे हैं। डिबाई सीट पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की पारंपरिक सीट है। इस सीट पर उनके पुत्र राजवीर सिंह भी जीत चुके हैं, लेकिन 2007 और 2012 के चुनाव में उन्हें गुड्डू पंडित से मात खानी पड़ी थी।
डिबाई सीट पर आजादी के बाद से सर्वाधिक बार भाजपा-जनसंघ के प्रत्याशी ही जीतते आए हैं। यह सीट लोध बाहुल्य सीट हैं। हालांकि यहां ब्राह्मण, मुस्लिम, जाटव समाज के मतदाता भी निर्णायक भूमिका में हैं। डिबाई सीट पर सर्वाधिक बार चुनाव जीतने का रिकॉर्ड बाबू हिम्मत सिंह के नाम रहा है।
वह इस सीट से लगातार छह बार विधायक बनकर रिकॉर्ड बना चुके हैं। इसके अलावा राम सिंह तीन बार और गुड्डू पंडित दो बार चुनाव जीत चुके हैं। अब देखना होगा कि इस बार मतदाता किस प्रत्याशी का भविष्य तय करते हैं।