मां का आंचल तो कहीं सिर से उठा पिता का साया
बुलंदशहर। ‘ मां-बाप का साया रहा न सिर पे, आंखें खोलते ही मैने बचपन खो दिया’ किसी शायर की यह पंक्तियां उन बच्चों पर सटीक बैठती हैं, जिन्होंने कोराना काल के दौर में अपने माता या पिता को खो दिया है। इस महामारी की चपेट में आकर जहां काफी लोग संक्रमित हुए हैं। वहीं, कई बच्चों को जिंदगी भर नहीं भूलने वाला गम भी दे गया है। किसी की मां का आंचल इस महामारी ने छीन लिया तो किसी बच्चे के सिर से पिता का साया ही उठ गया। इस दुनिया में अपना जीवन बसर करने के लिए अब उन्हें बचपन भूल कर बड़ा होने पर मजबूर होना पड़ेगा।
केस एक
पिता की मौत के बाद अब मां का सहारा भी छूटा
मूल रूप से खानपुर क्षेत्र के गांव माजरा निवासी नानक चंद लोधी पहासू में रहते थे। पहासू में उनकी ससुराल थी और नगर पंचायत द्वारा बनवाए घर में परिवार रहता है। वह श्रमिक का कार्य करते थे। करीब डेढ़ वर्ष पूर्व लीवर कैंसर की वजह सेे उनका निधन हो गया। इसके बाद परिवार और दोे बच्चों की जिम्मेदारी उनकी पत्नी लता देवी पर आ गई। बड़ी बेटी ज्योति की शादी वर्ष 2017 में हो गई थी। पिता के निधन के बाद दूसरी बेटी प्रियंका जिसकी उम्र अभी 20 वर्ष है, उसकी पढ़ाई छूट गई। वह दसवीं में पढ़ती थी। पिता की मौत के बाद उसने मां के साथ मजदूरी आदि कर गुजारा करना शुरू किया। कोराना की चपेट में आने से 16 दिन पहले उसकी मां की भी मौत हो गई। अब परिवार में प्रियंका और उसका 14 वर्षीय भाई अंश अकेले रह गए हैं। अंश अभी प्राथमिक पाठशाला में कक्षा पांचवीं में पढ़ता है। दोनों की बड़ी बहन ज्योति ने बताया कि अब परिवार में माता पिता के नहीं रहने से भाई बहनों की परवरिश में समस्या का सामना करना पड़ेगा। घर की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है।
केस दो
उठा पिता का साया, मां पर तीन बच्चों की जिम्मेदारी
मूल रूप से शिकारपुर तहसील निवासी प्रभाकर दत्त शर्मा का परिवार वर्तमान में यमुनापुरम में रहता है। आठ मई को कोराना संक्रमण के चलते प्रभाकर दत्त शर्मा की मौत हो गई। परिवार में पत्नी रश्मि के अलावा तीन बच्चे देवांश (17) भूमिका (15) और चार्बी (04) हैं। कोरोना से असमय काल के गाल में समाने वाले प्रभाकर के परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा है। पत्नी रश्मि ने बताया कि उनके पति बिल्डिंग मैटेरियल सप्लाई का काम करते थे। वह गृहणि हैं, पति के निधन के बाद उनसे बिल्डिंग मैटेरियल का सामान ले जाने वाले लोगों से संपर्क किया गया तो सबने हाथ खड़े कर दिए। सबका कहना है कि उनकी कोई देनदारी नहीं है। उनका बड़ा बेटा देवांश 11वीं कक्षा में, भूमिका नौवीं कक्षा और चार्र्बी अभी नर्सरी में पढ़ती है। ऐसे में अब तीन बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और जीवन यापन कैसे होगा, सवाल सामने खड़ा हो गया है।
जनपद में जिन बच्चों के माता और पिता की कोराना से मौत हुई है और उनके पास जीवन यापन के कोई साधन नहीं है। शासन के निर्देश पर ऐसे लोगों को चिन्हित किया जा रहा है। रिपोर्ट बनाकर शासन को भेज दी जाएगी। इसके बाद निर्देश मिलने पर अग्रिम कार्यवाही की जाएगी।
- डॉ. भूपेंद्र सिंह, सदस्य, बाल कल्याण समिति