जिला अस्पताल में करोड़ों की लागत से बन रही मैटरनिटी विंग बाल श्रमिकों के पसीने से बनकर तैयार हो रही है।
निर्माणाधीन इमारत के बाहर बेशक नाबालिगों के काम करने पर प्रतिबंध के बोर्ड लगे हों, लेकिन हकीकत से यह कोसों दूर है। 14-15 साल नहीं बल्कि सात से आठ साल के बच्चे यहां काम करते दिख रहे हैं।
निरीक्षण के दौरान अफसरों को भी यह नहीं दिख रहा है। बता दें कि जहां श्रमिकों की मजदूरी 250 से 300 रुपये के बीच है। वहीं बाल श्रमिकों से 100 रुपये में पूरा काम करा लिया जाता है।
जिला अस्पताल में करीब 20 करोड़ की लागत से मैटरनिटी विंग का निर्माण किया जा रहा है। विंग की निर्माणदायी संस्था ने बोर्ड लगा रखे हैं कि यहां नाबालिग को काम नहीं दिया जाता है।
एक अन्य बोर्ड पर लिखा है कि नाबालिग से काम लेना वर्जित है। लेकिन हकीकत कुछ और है। नाबालिग यहां पसीना बहाते देखे जा रहे हैं। महज सात से आठ साल की उम्र के बच्चों से काम लिया जा रहा है।
धमेड़ा अड्डा निवासी सोहित पुत्र आशित (8) और अनस (7) छुट्टी के दिन ईंट ढोते देखे गए। यह बच्चे ईंटों को गधों पर लादकर मैटरनिटी विंग तक पहुंचा रहे थे।