राजस्थान के कोटा में सरकारी अस्पताल में बच्चों की मौत का मामला भले ही देशभर में सुर्खियां बना हो, लेकिन हालात अपने जिले में भी बहुत अच्छे नहीं हैं। नौ माह में जिला महिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में इलाज के दौरान 111 बच्चों की मौत हो चुकी है। वहीं, कुछ बच्चों ने रेफर होने के बाद हायर मेडिकल सेंटर जाते समय दम तोड़ चुके हैं। गत माह पूर्व पड़ी सर्दी के साथ सीएचसी-पीएचसी समेत महिला अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ का पद रिक्त रहना भी बच्चों की मौत का कारण बना। खुर्जा, सिकंदराबाद में एक-एक और जिला अस्पताल में मात्र दो बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती है। जबकि अन्य स्थानों पर काफी समय से बाल रोग विशेषज्ञ का पद रिक्त चल रहा है।
जिला अस्पताल की ओपीडी में जहां प्रतिदिन 400 से अधिक बच्चे इलाज के लिए आते हैं। वहीं, जिला महिला अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ को छोड़ अन्य सुविधाएं हैं। वहीं, इन दोनों अस्पतालों के साथ खुर्जा स्थित जटिया चिकित्सालय और सिकंदराबाद स्थित संयुक्त चिकित्सालय को छोड़ दिया जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों के इलाज की व्यवस्थ न के बराबर है। ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर जहां पर्याप्त चिकित्सक नहीं हैं। वहीं, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर चिकित्सकों के साथ बाल रोग विशेषज्ञ का पद वर्षों से रिक्त चल रहे हैं। सुविधाओं से लैस अकेले जिला महिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में मार्च 2019 से दिसंबर 2019 तक 111 बच्चों ने दम तोड़ दिया। चिकित्सक कुछ बच्चों की मौत समय से पहले जन्म लेना तो कुछ बच्चों की मौत अन्य कारण से होने की बात कह रहे हैं। वहीं, गंभीर हालत में यहां से बच्चों को हायर मेडिकल सेंटर रेफर कर दिया जाता है। जब तक बच्चे वहां पहुंचते हैं तब तक उनकी हालत बेहद गंभीर हो जाती है और उन्हें बचा पाना मुश्किल हो जाता है।
सीएमओ डॉ. केएन तिवारी - चिकित्सकों की कमी के बाद भी सरकारी चिकित्सालयों पर आने वाले बच्चों को बेहतर उपचार देने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। शासन से कई बार बाल रोग विशेषज्ञ की मांग की जा चुकी है। स्टाफ की कमी होने के कारण सीएचसी-पीएचसी से नवजातों को जिला महिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता है। जिला महिला अस्पताल में नवजातों की देखरेख तैनात चिकित्सक द्वारा किया जाता है।