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हिंदू आस्थाओं को उकेरते हैं अब्दुल्ला

Thu, 06 Oct 2016 11:52 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/बुलंदशहर
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अब्दुल्ला - फोटो : अमर उजाला
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‘एक ही पत्थर लगे हैं, हर इबादत गाह में, गढ़ लिए एक बुत के सबने आफसाने कई ’ तरफ जहां हिंदु-मुसलमानों में नफरत की खाई गहरी होती जा रही है। नजीर बनारसी की यह शायरी पॉटरी नगरी के अब्दुल्ला पर बिलकुल सटीक बैठती है।
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पुरखों की बिरासत में मिली अपनी कला के जरिए अब्दुल्ला हिंदू आस्थाओं को अपने हाथों से गढ़ते हैं। अपनी हस्तशिल्प और बेजोड़ नक्काशी से हिंदू धर्म से जुड़े गणेश, लक्ष्मी, राशिचक्र आदि उत्पाद तैयार कर अब्दुल्ला मजहब के नाम मर मिटने वालों के लिए एक मिसाल पेश कर रहे हैं।

खास बात है कि अपनी इस कला को पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि विरासत को जिंदा रखने के लिए संजोए हुए हैं। अब्दुल्ला ने ओडिशा स्थित एक विद्यालय की मांग पर हाल ही में जगन्नाथ पुरी की तर्ज पर एक नक्काशी तैयार की है।
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इस्लामा बाद निवासी अब्दुल्ला ने अपने घर में ही छोटी सी जगह बना रखी है। जहां बैठकर पूरे दिन वह अपनी इस हस्तशिल्प कला को जीते हैं। अब्दुल्ला ने बताया कि वह फरीदाबाद के एक व्यवसाई से जुड़े हुए हैं और वहीं से काम का आर्डर मिलता है।

हाल में ही उन्होंने ओडिशा स्थित जगन्नाथपुरी की तर्ज पर एक सिरेमिक उत्पादों से बनी एक मूर्ति तैयार की है। इसके अलावा हिंदू धर्म से जुड़े कई देवी देवताओं की मूर्तियां,  राशि चक्र, कोर्णाक सूर्य मंदिर की तर्ज पर सूर्य देवता, वास्तु शास्त्र से जुड़ी कच्छप आदि चीजें वह बना चुके हैं।

अब्दुल्ला ने बताया कि हस्तशिल्प कला की यह विरासत उनके पिता यासीन से मिली। पिता की इस विरासत को वह मिटाना नहीं चाहते। अपनी कला को जिंदा रखने के लिए अब्दुल्ला अपने बेटे इमरान को भी सिखा रहे हैं।

अब्दुल्ला ने दबे मन से बताया कि उन्हें आज तक मुस्लिम धर्म से संबंधित किसी भी उत्पाद के लिए आर्डर नहीं आया। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि आज लोग मजहब के नाम पर राजनीति कर रहे हैं। जो इंसानियत के लिए खतरनाक है। उन्होंने कहा कि वह इस कला को जिंदा रखने के लिए काम करते हैं। 
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