मरकर भी अमर रहेगा कलियुग का ‘भीम’
- भीमसेन ने लाला लाजपत राय चिकित्सा विद्यालय को किया अपनी देह का वसीयतनामा
- पुलिस में करते थे नौकरी, आंख खराब होने पर ले लिया था वीआरएस
आशीष मणि त्रिपाठी
खुर्जा। कल खेल में हम न हों, गर्दिश में सितारे रहेंगे सदा...। किसी शायर की यह पंक्तियां 59 वर्षीय भीमसेन के ऊपर सटीक बैठती हैं। मौत के बाद भी वह किसी के काम आ जाएं, कुछ इसी जज्बे के साथ जीते जी ही उन्होंने अपने शरीर का वसीयतनामा लाला लाजपत राय स्मारक महाविद्यालय मेरठ के नाम कर दिया है। मरने के बाद उनकी देह वहां के छात्रों के शिक्षण और अनुसंधान के काम आएगी। वहीं उन्होंने मरने के बाद भी जिंदा रहने की ख्वाहिश रखते हुए अपने शरीर के अंगों को किसी जरूरतमंद को निशुल्क दान करने की अनुमति भी महाविद्यालय को दी है।
क्षेत्र के गांव नेहरूपुर निवासी भीमसेन पुत्र लज्जाराम पुलिस में सिपाही के पद पर तैनात थे। लेकिन आंख खराब होने के बाद उन्होंने वर्ष 2010 में वीआरएस ले लिया। परिवार में पत्नी सीमा और बेटे दीपक के साथ वह रहते हैं। दो बेटियां हैं, जिनकी शादी वह कर चुके हैं। शुरू से ही दूसरों के प्रति सेवा भाव रखने वाले भीम सेन पुलिस की नौकरी दौरान भी जरूरतमंदों की मदद करते रहे। भीमसेन बताते हैं कि पुलिस की नौकरी कांटो पर चलने जैसी होती है, लेकिन उन्होंने कभी अपने ईमान, धर्म और इंसानियत को नहीं छोड़ा। वह हमेशा दूसरों की मदद के लिए तत्पर रहे। मरने के बाद भी वह किसी के काम आ सकें, इसलिए उन्होंने मेरठ स्थित लाला लाजपत राय स्मारक चिकित्सा महाविद्यालय को अनुसंधान एवं शिक्षण कार्य के लिए अपने शरीर का वसीयतनामा कर दिया। किसी जरूरतमंद की जिंदगी खुशहाल हो सके, इसलिए उन्होंने अपने मृत शरीर के प्रत्यारोपित अंगों को किसी जरूरतमंद को निशुल्क दान देने की अनुमति महाविद्यालय को दी है।