महात्मा गांधी का बदायूं में दूसरा दौरा नौ नवंबर 1929 को हुआ। गांधी जी ने यहां प्रचीन गुरुकुल महाविद्यालय में क्रांतिकारियों को संबोधित किया। गांधी जी के भाषण से क्रांतिकारी काफी प्रभावित हुए। इसके कुछ दिनों बाद ही गांधी जी ने 12 मार्च 1930 में डांडी से नमक कानून तोड़ने के लिए यात्रा चालू कर दी। इस बारे में बदायूं में आजादी के दीवानों को पता लगा तो वे भी आंदोलन में पूरी तैयारी के साथ कूद पड़े। जिले में कई जगह नमक कानून तोड़ा गया। अंग्रेज हुक्मरानों ने कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। सबसे पहले नमक कानून अलापुर में तोड़ा गया। अलापुर और गुलड़िया में आस-पास के कई जिलों से क्रांतिकारी भी आंदोलन में हिस्सा लेने पहुंचे थे। अलापुर में पंडित विभूति प्रसाद में नमक कानून के विरोध को लेकर बेहद उत्साह था। उन्होंने 16 मार्च 1930 को अपने क्रांतिकारी साथियों के संग थाने के सामने आहते में नमक बनाने का कार्यक्रम रखा। नुनखरी मिट्टी के साथ पानी को खौलाकर कढ़ाहों में नमक बनाने लगे। जानकारी मिलने पर चंद कदम दूर थाने से अंग्रेजों के सिपाही आहते में पहुंच गए। अंग्रेज सिपाहियों ने पंडित विभूति प्रसाद को नमक बनाने से रोका। इस पर विभूति प्रसाद ने अंग्रेज सिपाहियों का डटकर मुकाबला किया। यहां क्रांतिकारी संख्या बल में कम थे। इसका फायदा उठाते हुए अंग्रेज सिपाहियों ने खौलते पानी का कढ़ाहा विभूति प्रसाद पर पलट दिया। इससे अफरा तफरी मच गई। पंडित विभूति प्रसाद खौलता पानी गिरने से बुरी तरह झुलस गए। स्वतंत्रता के दीवाने क्रांतिकारियों ने उनको बदायूं लाकर कांग्रेस के कैंप कार्यालय में रखा। इसके बाद उनका इलाज जिला लंबे इलाज के बाद वह ठीक तो हो गए, लेकिन उनके शरीर पर जलने के निशान ताउम्र बने रहे।