सिरासौल में श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह के चौथे दिन बोले गोपालाचार्य
बताया कि कंस अपनी चचेरी बहन देवकी से बेहद स्नेह करता था। तभी वह विवाह के बाद उसे वासुदेव के साथ रथ से छोड़ने का निर्णय लेता है। मथुरा से वह थोड़ी दूर ही निकला होगा कि तभी आकाशवाणी होती है कि हे कंस आज तू इतने प्रेम के साथ अपनी बहन को छोड़ने जा रहा है। इसका आठवां पुत्र ही तेरा काल बनेगा। यह सुनकर कंस घबरा जाता है और देवकी को जान से मारने का निर्णय लेता है। तभी वासुदेव ने अपनी चतुरता को दिखाते हुए कंस को समझाया। तुम्हारा काल देवकी नहीं है, उसका आठवां पुत्र है। जैसे ही देवकी के संतान पैदा होगी। उसे मैं आपके पास लेता आऊंगा। तब कंस देवकी और वासुदेव मथुरा की कारागार में डलवा देता है। जैसे ही देवकी के आठवां पुत्र होता है, तो वासुदेव उसे नंदगांव में यशोदा के पास छोड़कर उसकी पुत्री को उठाकर कंस के पास ले जाते हैं। जैसे ही कंस कन्या को मारने के लिए उठाता है। तो वह बिजली बनकर आकाश में चली जाती है। इस प्रकार श्रीकृष्ण का नंद गांव में पालन-पोषण शुरू हो जाता है।
महाराज ने कहा कि मारने से वाले से हमेशा बचाने वाला बड़ा होता है। ईश्वर से किसी भी प्राणि की मृत्यु का समय जो निर्धारित किया है ठीक उसकी मृत्यु उसी समय पर होगी। समय के साथ सब कुछ वैसा ही होता जाता है। इससे पहले यहां वैदिक मंत्रों के साथ सभी आचार्यों ने यज्ञ में आहुतियां दीं। दिनेश चंद्र भारद्वाज देव नारायन, दामोदराचार्य आदि का विशेष सहयोग रहा। आयोजकों ने बताया कि 22 नवंबर को मां भगवती का विशाल जागरण होगा।