बदायूं। गुलज़ारे सुख़न साहित्यिक संस्था की ओर से शहर के मोहल्ला सोथा स्थित फरशोरी मंज़िल पर एक भव्य मुशायरे का आयोजन किया गया। यह मुशायरा पूरी तरह कौमी एकता को समर्पित रहा, जिसमें नामचीन और युवा शायरों ने अपने बेहतरीन अशआर और ग़ज़लें सुनाकर अदब और मोहब्बत की महफ़िल को सजाया।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. दानिश बदायूंनी ने नात-ए-पाक से किया, इसके बाद कुमार आशीष ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर महफ़िल को आध्यात्मिक स्वर प्रदान किया। इसके बाद एक से बढ़कर एक शायर मंच पर आए और श्रोताओं की तालियों से पूरा हाल गूंजता रहा। सुरेंद्र नाज़ बदायूंनी ने शिक्षा और ज्ञान की अहमियत पर शेर सुनाया अगर बेइल्म हो तो डिग्रियां काग़ज़ के टुकड़े हैं, अगर हैं डिग्रियां तो ज्ञान भी होना ज़रूरी है। सादिक अलापुरी ने समाज की कटु सच्चाई को यूं बयां किया कहा जब दवा मोअतबर नहीं होती, बात भी बा असर नहीं होती। समर बदायूंनी ने इश्क़ की गहराई को अपने अल्फ़ाज़ में ढाला गुंचा-ओ-गुल कली से क्या मतलब, तेरे होते किसी से क्या मतलब। कार्यक्रम में श्रोताओं ने हर शेर पर दाद दी और मुशायरे को ऐतिहासिक बना दिया।