वन महोत्सव पर विशेष-
अंग्रेजी राज में विदेश से लाकर लगाए गए पौधे जमीन कर रहे बंजर
‘बोये पेड़ बबूल के आम कहां से आय’ कहावतों में छाया रहने वाला बबूल अब मुसीबत का पर्याय बन रहा है। यह वह बबूल है जो अंग्रेजों ने यहां लाकर लगा दिया। विलायती बबूल के नाम से जाना जाने वाला बबूल हरियाली बढ़ाने को लगाया था। हरियाली तो की रहा है लेकिन जमीन के लिए नासूर बन गया है। पर्यावरण को भी हानिकारक माना जाता है। इसके कांटे देसी प्रजाति के पेड़-पौधों को नष्ट कर रहे हैं। इसपर नियंत्रण होना आवश्यक है।
कादरचौक क्षेत्र में सात बन क्षेत्रों का लगभग 1100 हेक्टेयर भूभाग है, जिनमें ककोड़ा में 184.54 हेक्टेयर में पौधरोपण को विलायती बबूल के अस्सी हजार पौधे भेजे जा रहे हैं। 11 जून होने वाले रिकार्ड पौधरोपण के नाम पर इसी घातक बबूल के 1,10,550 पौधे लगाए जाएंगे। जिनमें से 80 हजार ककोड़ा, 15,500 उलाई खेड़ा 8,800 सुंदरायन, 6,250 सिमरा में लगेंगे। विलायती बबूल कितना पानी सोखता है इसका कोई अध्ययन तो नहीं हुआ है लेकिन किसान विलायती बबूल के कारण पानी की कमी की शिकायत जरूर करते रहे हैं। इसकी जड़ें भूमिगत जल का पीछा करती है वह जितना नीचे जाता है वे भी उतनी ही गहराई तक जाती हैं। आसपास के क्षेत्र मे भी वायु की नमी को खत्म कर देता है, जिससे दूसरे पौधे नष्ट होते है। पर्यावरण की की दृष्टि से भी यह अनुपयोगी सिद्ध हो रहा है। क्योंकि यह बहुत कम कार्बन सोखता है।
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उपयोगी लकड़ी न जंतुओं को भोजन
विलायती बबूल एक तीखी कांटेदार झाड़ी हैं, जिसकी पत्ती भी बहुत छोटी होती है। जिससे इसकी लकड़ी किसी उपयोग में नहीं ली जा सकती। जंगली जंतु भी इसकी पत्तियों को नहीं खा सकते सिर्फ ईधन के उपयोग में ही इसकी झाड़ी को लिया ला सकता है।
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किनारे बबूल के कारण सड़के हो रही संकरी
विलायती बबूल को सड़क किनारे लगाने से इसकी झाड़ियां सड़क तक को घेर लेती हैं, जिससे सड़कें संकरी हो जाती है वहीं ककोडा प्रधान अनिल द्विवेदी ने कहा कि ककोड़ा के जंगल में सभी तरह के पौधे हो सकते हैं। जिसमें खजूर, ढाक, शीशम, नीम आदि के पौधे पनप रहे हैं। विलायती बबूल कांटेदार जंगल है जो न तो कोई उपयोगी होता है न ही वन्य जंतुओं के अनुकूल है। इसे हटाकर सरकार की मंशा के अनुरूप फल-फूलदार पौधे लगाए जाएं।
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वैज्ञानिक नाम
विलायती बबूल का वैज्ञानिक नाम प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा है।1870 में इसे भारत लाया गया था, यह मूल रूप से दक्षिण और मध्य अमेरिका एवं कैरिवियाई देशों में पाया जाता है।
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विलायती बबूल केवल ककोड़ा, उझानी, सिकंद्राबाद के वनों में ही लगाया जाएगा। वनों में नर्सरी भेजी जा रही है। 11 जून को सभी जगह एक साथ पौधारोपण किया जायेगा। ढाक और खजूर स्वयं उग रहे हैं, जिससे पता चलता है कि जमीन बेहतर हो रही है। घास और झाड़ी उगने पर वन अन्य वृक्षों के लिए भी उपयोगी हो जाता है। सुंदरायन, उलाईखेड़ा, ननाखेड़ा सिमरा में शीशम, खैर, जंगल जलेबी, यूकेलिप्टस, पीपल, बरगद आदि पेड़ लगाए जाएंगे।
-सत्येंद्र चौधरी, रेंजर ।