एक तो किसान बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि में तबाह हो चुका है। दूसरी ओर सरकारी गेहूं क्रय केंद्रों के साथ ही आढ़तों पर भी उनका जमकर आर्थिक दोहन किया जा रहा है। मजबूर और बेबस किसान औने-पौने दामों पर ही गेहूं बेच रहा है। बावजूद इसके किसी बड़े प्रशासनिक अधिकारी ने इस ओर ध्यान देना गंवारा नहीं समझे रहे।
एक तो किसान कुदरत की मार में अधमरा हो चुका है। जैसे-तैसे बची खुची फसल को ही अपना भाग्य मानकर परिवार की गाड़ी चलाने के लिए योजनाएं बनाईं। इसमें भी बाधा गेहूं बेचने को लेकर आ रही है। सरकार ने गेहूं का समर्थन मूल्य 1450 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया है। कई सरकारी संस्थाओं के अलावा इस बार आढ़तियों को भी गेहूं खरीदने की जिम्मेदारी सौंपी है। सरकार की मंशा किसान को समर्थन मूल्य प्राप्त कराने और समय पर उसका गेहूं बिकने की है, लेकिन ये मंशा धरातल पर पूरी नहीं हो रही है। बाजार में गेहूं की आमद अच्छी चल रही है, लेकिन किसान को समर्थन मूल्य 1450 के बजाय तेरह सौ रुपये प्रति क्विंटल का मूल्य मिल रहा है। इस तरह 150 रुपये प्रति क्विंटल का चूना लग रहा है। यह गेम आढ़तियों की आड़ में खेला जा रहा है।
नियमत: आढ़ती को समर्थन मूल्य पर किसान का गेहूं खरीदना चाहिए। सरकार आढ़ती को डेढ़ प्रतिशत की कमीशन देगी, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा। मनमाने किसानों की सूची लगाकर आढ़ती ट्रक सरकारी संस्थाओं को भेज देते हैं। वहां से आढ़ती को समर्थन मूल्य की दर से भुगतान मिल जाता है। इस खेल में सरकारी संस्थाएं व संबंधित अधिकारी भी जुड़े हैं। सरकारी अधिकारी-कर्मचारी इस योजना में सीधी खरीद के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित हैं।
किसान का गेहूं समर्थन मूल्य पर ही खरीदा जाना चाहिए। यदि कहीं कम दर पर गेहूं को खरीदा जा रहा है, तो वो अपराध की श्रेणी में आता है। आढ़तियों और खरीद केंद्रों पर अचानक छापामारी की जाएगी। जो भी गलत करता पाया जाएगा उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। - ओपी तिवारी, एसडीएम दातागंज