खुले में शौच जाने से दूषित हो रहीं पतित पावनी मां गंगा
आठ गांवों के 503 शौचालयों में अधिकांश उपयोगविहीन
स्वच्छ भारत अभियान के तहत लोगों को खुले में शौच न जाने और शौचालयों का प्रयोग करने की मुख्य जिम्मेदारी निभाने वाले ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और मास्साब भी खुले में शौच जा रहे हैं। अब उस गांव में शौचालयों का प्रयोग करने वाले लोगों के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। अगर आपको यह मजाक लगता है तो ब्लाक की ग्राम पंचायत मुगर्रा टटेई में जाकर देख लें, तो तस्वीर साफ हो जाएगी।
ग्राम पंचायत मुगर्रा टटेई के अंर्तगत नब्बीनगला, गबडू नगला, मुंशीनगला, पुन्नीनगला, लक्ष्मणनगला, खर्गीनगला एवं जुम्मीनगला आठ गांव आते है। पतित पावनी मां गंगा किनारे बसे इस गांव को खुले में शौच जाने से मुक्त करने के लिए ग्राम पंचायत को वित्त वर्ष 2012-13 में लोहिया गांव में रखा गया था। इसके तहत गांव में 503 शौचालय बनवाए गए थे। इसमें से चंद शौचालयों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश का प्रयोग नहीं किया जा रहा है। इनमें कंडा रखने एवं रसोईघर के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।
शौचालयों की हकीकत जानने पहुंचे अमर उजाला प्रतिनिधि ने सच जानने के लिए प्रधान हबीव अहमद उर्फ हफीज के घर पहुंची तो कैमरा देखकर आनन-फानन में शौचालय में भरे उपले और लकड़ी बाहर निकालने लगे। स्थानीय लोगों के मुताबिक प्रधान का उनका परिवार ही खुले में शौच करने जाता है।
गांव के क्षेत्र पंचायत सदस्य के यहां भी यही हाल था। पूरे आठ मजरों दो शिक्षक, रोजगार सेवक, आंगनबाड़ी वर्कर, प्रेरक, रसोइया, कोटेदार आदि जो सरकार से सीधे जुड़े हैं, लेकिन शासन की मंशा के अनुसार शौचालयों का प्रयोग नहीं कर रहे हैं। इनमें बस आंगनबाड़ी वर्कर मुन्नी और एक शिक्षक समीम के यहां शौचालय प्रयोग में लाए जा रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में शौचालयों का प्रयोग न होने के पीछे सिर्फ जागरुकता की कमी है। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्र के अनपढ़ नहीं बल्कि पढ़े-लिखे लोग भी जिम्मेदार हैं। यही हाल रेवा का भी है, वहां निजाकत का आरोप है कि शौचालय बनवाने में पैसे का दुरुपयोग किया गया और मानक के अनुरूप नहीं बनाए गए। इस वजह से ही उनका प्रयोग नहीं किया जा रहा है।
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गांव में लोग खुले में शौच न जाएं, इसलिए शौचालयों का निर्माण कराया गया। अब उनका प्रयोग नहीं किया जा रहा है तो इसकी जांच कराई जाएगी।
-भीमजी उपाध्याय, खंड विकास अधिकारी