वेद कथा के अंतिम दिन सैकड़ों की संख्या में यहां श्रोता मौजद रहे। आचार्य संजीव रुप ने कहा कि संसार में प्रत्येक प्राणी सुख की तलाश में भटक रहा है वो पूर्ण सुखी होना चाहता है किन्तु आश्चर्य यह है कि असंख्य भौतिक सुख के साधन होने पर भी कोई खुद को सुखी नहीं कहता। संसार में सुख, शांति और आनंद का केंद्र ईश्वर है।
आर्य समाज गुधनी के तत्वावधान में चल रही वेदकथा के 15वें दिन समापन हो गया। आचार्य ने कहा कि जन्म से मृत्यु तक सुख के साधन जुटाता है विद्या में, डिग्री में, नौकरी में, सोने में, भवनों में, वस्त्रों में, रुप में, यौवन में, पद में, प्रतिष्ठा में, सम्मान में, ढूंढ़ते-ढूंढ़ते और वह यह सुख मानो उससे उतनी ही दूर खड़ा होता है, जितना कि धरा से दूर गगन। इसलिए सच्चा सुख परम शांति तो ईश्वर के समीप आने व रहने से ही संभव है। भक्ति से सदा सुख हुआ है फिर भक्ति चाहे माता-पिता ही हो। राष्ट्र की हो, मां की हो या ईश्वर की। इसके बाद आचार्य रुप ने दक्षिणा में गुटखा, शराब, मांस, जुआ, सट्टा, गाली, अनेक बुराइयां मांगी।
इस मौके पर बद्रीप्रसाद आर्य, किशनपाल, सुखवीर, विनीत कुमार सिंह, सूरजवती, कमलेश कुमारी, प्रज्ञा आर्य, मोना, सुल्तान सिंह, मुन्नी देवी, धनवती, नेम देवी, प्रिंयका, विनीत कुमार, तानिया आदि मौजूद रहे।