वन विभाग की ओर से कराया गया पौधरोपण सफल रहता तो जिले में हरियाली ही हरियाली होती। हरियाली कैसे आए इसके लिए कई तरह से लोगों को जागरूक तो किया जा रहा है, लेकिन जिम्मेदार लोग सही से कार्य नहीं कर रहे। कहा तो यहां तक जा रहा है कि एक ही स्थान पर कई सालों से पौधरोपण होता चला आ रहा है। मनरेगा से फर्जी बिल-बाउचर के जरिए पौध की खरीदारी हो जाती है। मौके पर कागजों पर पौधे रोपित कर वन विभाग अपना काम पूरा कर देता है। इस तरह हर साल करोड़ों के बजट से सिर्फ कागजों पर पौधे लगाए जाते हैं।
जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि मनरेगा से नर्सरी तैयार करने के लिए दो साल से कोई बजट नहीं आया है।
जिले में पिछले वर्ष 637000 पौधे रोपित करने की लागत दो करोड़ दिखाई गई और इस वर्ष 372370 पौधे रोपित करने के लिए एक करोड़ की लागत कागजों पर दर्शाई गई। हर साल एक लाख से अधिक की पौध तैयार की जाती है। उद्यान विभाग भी वर्ष में लगभग इतने ही फलदार और शोभादार पौध तैयार करता है। जुलाई माह से पौधरोपण अभियान शुरू होता है लेकिन कभी इसका सत्यापन नहीं कराया जाता। जिससे कागजों पर पौधरोपण का काम पूरा हो जाता है। बावजूद इसके धरती सूनी-सूनी नजर आती है।