पंचायत चुनाव अक्तूबर-नवंबर में होने की संभावना पर ही ग्राम पंचायतों में हलचल शुरू हो गई है। चुनाव को गोटियां बिछाई जाने लगी हैं। रंजिश के आधार बन रहे हैं। ऐसे में कानून व्यवस्था को लेकर प्रशासनिक अधिकारियों का ध्यान गांवों की ओर नहीं है। शिकवे-शिकायतें, अफवाहें आदि सब कुछ यहां जायज है। चुनाव के लिए गोटियां बिछाने को साम, दाम, दंड, भेद का सहारा लिया जा रहा है।
चुनाव आयोग ने अभी तक कोई संकेत नहीं दिए हैं। इसके बावजूद गांवों की स्थिति देखते ही बनती हैं। कहीं-कहीं तो ऐसा लगता है कि अभी जल्दी में ही चुनाव हैं। परिसीमित ग्राम पंचायतों में अभी आरक्षण तय होना है। चुनाव आयोग अधिसूचना जारी करेगा। इसके बाद लंबी प्रक्रिया में चुनाव होना है। इन सब बातों को दरकिनार कर राजनीतिक हथकंडे शुरू हो चुके हैं। सत्ताधारी लोग ब्लाक, थाना और अन्य लोगों के काम अटकाने वाले विभागों में पहुंचने लगे हैं। मौजूदा प्रधानों की शिकायतों का अंबार लगने लगा है। यही नहीं मतदाताओं को लुभाने के लिए लोग अपनी गांठ भी ढीली कर रहे हैं। इसके साथ ही गांवों में अंदरूनी रंजिश भी अपने पैर पसारने लगी है।
इसी बर्ष के आखिर में पंचायत चुनाव होने की आहट के चलते ही गांवों में लोग प्रधान, गांव पंचायत सदस्य, बीडीसी सदस्य और जिला पंचायत सदस्य पद के चुनाव को लेकर सरगर्मियों में शामिल हो रहे हैं। हालांकि अभी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को चुनाव आयोग तक से कोई संकेत नहीं मिल पा रहे हैं। पंचायतों को विकास के लिए मिलने वाले धन के लिए ही यह सब हो रहा है। कोई गावं की सेवा के लिए चुनाव मैदान में आने की नहीं सोच रहा। यह गांव के लोग भी जानते हैं फिर भी उनकी रणनीति का शिकार हो रहे हैं। इसके बावजूद भी प्रशासन की गांवों में बिगड़ रहे माहौल पर कोई निगरानी नहीं हो रही।