औषधीय खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई संजीवनी योजना जिले में खुद ही सहारे के लिए तरस रही है। बजट और सुविधाओं के अभाव में किसान औषधीय खेती से मुंह मोड़ने लगा है। स्थित यह है कि चालू वित्तीय वर्ष में योजना के तहत एक भी किसान को अनुदान नहीं मिला है। नतीजन औषधीय खेती के रकबा में करीब 150 हेक्टेयर की गिरावट आई है।
केंद्र सरकार द्वारा औषधीय खेती को बढ़ावा देने के लिए 2014 में संजीवनी योजना शुरू की गई थी। इसमें औषधीय खेती करने वाले किसानों को फसल की कुल लागत के 30 प्रतिशत अनुदान का प्रावधान है। योजना लागू करने का मुख्य उद्देश्य किसानों की आर्थिक स्थिति को सुधारना है। वित्तीय वर्ष 2014-2015 में योजना की ओर किसानों का रुझान दिखा। जिले में करीब 300 हेक्टेयर में तुलसी और सतावर जैसी औषधीय फसलें हुईं। 90 किसानों को अनुदान भी मिला। वित्तीय वर्ष 2015-16 में किसानों का औषधीय खेती से मोहभंग होने लगा। चालू वित्तीय खत्म होने को है, लेकिन अब तक एक भी किसान को अनुदान नहीं मिला है। इसके चलते जिले में औषधीय खेती का रकबा घटकर सिर्फ 150 हेक्टेयर रह गया है। प्रोत्साहन न मिलने से संजीवनी योजना दम तोड़ती नजर आ रही है।
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जागरूकता के नहीं हो रहे उपाय
बदायूं। संजीवनी योजना के प्रति किसानों को जागरुक करने के उपाय भी नहीं हो रहे हैं। जिले की जल-वायु तुलसी, सतावर, सफेद मूसली, अश्वगंधा जैसी फसलों की औषधीय खेती के अनुकूल है, लेकिन इसको लेकर किसानों में जागरूकता का अभाव है। कृषि और उद्यान विभाग भी किसानों को जागरूक करने के लिए गंभीर नहीं हैं।
2015-16 का अब तक नहीं मिला बजट
बदायूं। स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा रहा है कि किसानों को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के लिए अब तक वर्ष 2015-16 का बजट जारी नहीं हुआ है। वित्तीय वर्ष खत्म होने में सिर्फ ढाई महीने का वक्त बाकी है। ऐसे में साफ है कि योजना के क्रियान्वयन को लेकर सरकार कितनी गंभीर है।
वर्जन-
पिछले वित्तीय वर्ष में जिले में करीब 300 हेक्टेयर में औषधीय खेती हुई थी। करीब 90 किसानों को लाभान्वित किया गया था। चालू वित्तीय वर्ष में रकबा कुछ कम हुआ है। किसानों को अनुदान के लिए अब तक चालू वित्तीय वर्ष का बजट नहीं मिला है। खेती का जो लक्ष्य दिया गया है, उसे पूरा करने की कोशिश की जा रही है।
-आरके वर्मा, जिला उद्यान अधिकारी