जिला पंचायत ने हमेशा से दिग्गजों मुंह की खिलाई है। इसके विशेष उदाहरण हैं। शांति देवी, तीन बार एमपी, चार बार एमएलए, एमएलसी रहीं। इनके पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चौधरी बदन सिंह दो बार एमपी रहे। राजनीतिक मजबूती के बाद भी वह जिला पंचायत नहीं जीत सकीं। दूसरे ऋषिपाल सिंह, खुद एमएलए और भाई प्रो. श्रीपाल सिंह एमएलए, एमएलसी रहे, लेकिन वह भी जिला पंचायत में अपनी जमीन नहीं बना सके। तीसरी पुष्पा देवी, खुद एमएलए रहीं, उनके पुत्र दो बार एमएलए रहे। जिला पंचायत में इन्होंने भी मात खाई। चौथी प्रेमवती यादव, खुद एमएलए रहीं, उनके पति श्यौराज सिंह यादव एमएलए रहे। इसके बाद जब जिला पंचायत के लिए चुनाव मैदान में उतरीं, तो जगह नहीं बना सकीं। पांचवी रेखा यादव, ससुर सपा के बनवारी सिंह यादव एमएलए, राज्यमंत्री और एमएलए रहे और पति आशीष यादव विधायक रहे, लेकिन जिला पंचायत में यह भी जगह नहीं बना सकीं।
राज्यमंत्री रहे भगवान सिंह शाक्य ने अपने परिवार के कई सदस्य जिला पंचायत में उतारे, लेकिन किसी को जिला पंचायत अध्यक्ष नहीं बना पाए। इस बार उनके परिवार में पुत्र, पुत्री, पुत्रवधू को चुनाव लड़ाया, लेकिन किसी को सदस्य तक नहीं बना सके। ब्रजपाल सिंह शाक्य के पिता नरोत्तम सिंह शाक्य कई बार एमएलए रहे। उनके वजूद पर जिला पंचायत में जोर आजमाइश कर चुके ब्रजपाल सिंह शाक्य भी जिला पंचायत के अध्यक्ष पद पर स्थान नहीं बना सके। अब परिस्थितियां क्या गुल खिलाती हैं, ये भविष्य के गर्भ में है।