तिनका-तिनका जोड़कर वर्षों में घरौंदा बनाया। हालात अब ऐसे हैं कि वह उजड़ जाए तो गम नहीं। बस, जिंदगी का सुकून कोई न छीने, बहन बेटियों की आबरू सलामत रहे। महाबा नदी की तलहटी में बसे गांव रसूलपुर टप्पा मलसई की दास्तान दर्दनाक है। वहां सताए जा रहे गरीबों से जब बात की गई तो पता चला कि एक जाति विशेष के चंद लोगों का कई दशकों से यहां आतंक है। सारा खेल जमीनों पर कब्जे को लेकर है। पुलिस भी खामोश रहती है। साल दर साल सैकड़ों परिवार गांव छोड़ गए। पलायन आज भी जारी है। बात जब ज्यादा बढ़ी तो पुलिस और प्रशासन ने किसी तरह आश्वस्त कर कुछ परिवारों को रोका जरूर। पर वर्दी पर उन्हें भरोसा नहीं। वे अब भी डरे हुए हैं। कहते हैं, देरसबेर बोरिया बिस्तर समेटना ही पड़ेगा। बलराम शर्मा की रिपोर्ट।
बदायूं। रसूलपुर टप्पा मलसई गांव में दबंगों का मुख्य निशाना मल्लाह-कश्यप बिरादरी के परिवार हैं। गांव से पलायन करने वाले परिवार इसी बिरादरी के हैं। सुरक्षा के नाम पर चार सिपाही और एक दरोगा की ड्यूटी एसपी देहात बालेंदु भूषण सिंह ने लगाई है। लेकिन मंगलवार की सुबह गांव में तीन सिपाही ही मिले। उनमें भी दहशत थी। क्योंकि कभी कभी ये भी शिकार हो जाते हैं।
करीब तीन हजार आबादी के इस गांव में साठ फीसदी यादव, शेष मल्लाह-कश्यप, जाटव, मुस्लिम, शाक्य और वाल्मीकि हैं। ऐसा नहीं है कि कहर सिर्फ मल्लाह और कश्यपों पर बरपा हो, इनकी जद में वे सभी गरीब-मजलूम हैं, जिनका कोई सियासी सरपरस्त नहीं है। पीड़ित बताते हैं कि सत्ता से संरक्षण पाए इन दबंगों ने कटरी की भूमि कब्जा रखी है। जीतपाल यादव और उसके साथियों को खाकी का कोई खौफ नहीं है। वह पुलिस वालों पर भी हमला कर चुका है। सात जुलाई 2014 को सहसवान में एक पेट्रोल पंप के मुनीम से पांच लाख रुपये लूटने के मामले में जीतराम का नाम सुर्खियों में रहा था। दो पुलिस वाले चंदन और हरेंद्र उसको पकडने के लिए गांव गए तो उसने दोनों सिपाहियों पर फावड़े से हमला कर दिया था, जिस में चंदन का हाथ कट गया। इसके बाद भी पुलिस भी उस पर सीधे हाथ डालने में कतराने लगी है। यही वजह है कि डकैती समेत कई धाराओं में रिपोर्ट हो जाने के बाद नामजदों की गिरफ्तारी अभी नहीं हुई है।
पुतन अली ने बताया कि कब जिल्लत की जिंदगी जिएं। कोई सुनने वाला नहीं है? जो यहां से चले गए, वे हमसे ठीक हैं।
..अब नहीं कोई सुनने वाला
करीब 75 बरस के अली जान भी दबंगों के सताए हुए हैं। दबंगों ने दो साल पहले उनके बड़े भाई बाबू को इतना पीटा कि उनकी कुछ दिन बाद मौत हो गई थी। वह कहते हैं कि पूर्व प्रधान नत्थू सिंह यादव ही अकेले हैं, जो उनको गांव से नहीं जाने दे रहे। पर अब उनकी सुनने वाला कोई नहीं। पहले पूर्व विधायक नन्हें मियां थे, तो कोई पास फटकता नहीं था।