बदायूं। ऐ जिंदगी तूने मुझे कब्र से कम जमीन दी है, पांव फैलाऊं तो दीवार में सिर लगता है....। ऐसा ही कुछ हाल यहां के जिला कारागार का है, जहां क्षमता से अधिक करीब तीन गुना बंदी बंद हैं। हर बैरक में खचाखच वाले हालात हैं। इन बैरकों में कभी बंदी आपस में भिड़ जाते हैं तो कभी जेल प्रशासन स्वयं विवादों में घिर जाता है। यहां की व्यवस्था कैसे संभल रही है, यह तो जेल प्रशासन ही जानता है।
जिला कारागार में इस समय कुल 1475 बंदी हैं, जिसमें 1089 बंदियों के मामले विचाराधीन चल रहे हैं, जबकि 339 बंदियों को सजा हो चुकी है। 51 किशोर बंदियों का बैरक अलग है। महिला बैरक में 30 महिला बंदी हैं और उनके 11 बच्चे बेगुनाह होकर भी जेल की सजा भुगत रहे हैं। इनके बैरकों से निकलने का और बंद रहने का समय पहले से निश्चित है। जेल नियमों के मुताबिक सुबह-शाम भोजन जरूर मिल जाता है लेकिन इसके लिए जेल प्रशासन को कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। हर व्यवस्था के लिए तीन गुने इंतजाम करने पड़ते हैं। खाना बनाने के लिए अधिक बंदियों को लगाया जाता है। इसकी तैयारी भी पहले से करनी पड़ती है। यानी जिला कारागार में ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो पहले से तैयारी करके नहीं चलाना पड़ता हो, तब कहीं व्यवस्था संभल पाती है।
जिला कारागार की क्षमता सिर्फ 529 बंदियों की है। इसके बावजूद जेल में 1475 बंदी हैं। इनकी चाय से लेकर भोजन तक की व्यवस्था तीन गुना करनी पड़ती है।
डेढ़ माह पूर्व ट्रांसफर हुए थे सौ बंदी
-जिला कारागार से करीब डेढ़ माह पूर्व सौ बंदियों को दूसरी जेल में ट्रांसफर किया गया था। इससे पहले जेल में करीब 17 सौ बंदी हो गए थे। तब यहां की व्यवस्था पूरी तरह से डगमगा गई थी। धीरे-धीरे करके बंदियों को ट्रांसफर किया गया था। जिला कारागार से अब तक करीब तीन सौ बंदी दूसरी जेल में शिफ्ट हो चुके हैं।
मानसिक रोगी बंदियों का रखना पड़ता है खास ध्यान
-जिला कारागार में करीब 11 बंदी मानसिक रोगी हैं। इनका विशेष रूप से ध्यान रखना पड़ता है। उन्हें किस समय बैरक से निकाला जाएगा और किस समय अंदर किया जाएगा। इस दौरान कड़ी सुरक्षा होती है। बिगड़ जाएं तो हालात मुश्किल में पड़ जाते हैं, जिससे इनके साथ प्रेम पूर्वक व्यवहार भी किया जाता है।
कुछ दिन पहले बंदी कर चुके हैं भूख हड़ताल
- कुछ दिन पहले जिला कारागार के करीब 20-25 बंदी भूख हड़ताल पर बैठ गए थे। उन्होंने जेल प्रशासन पर हफ्ता वसूली का आरोप लगाया था। हालांकि बाद में मामला धीरे-धीरे शांत हो गया। इस संबंध में जेलर आदित्य कुमार ने एक रिपोर्ट बनाकर उच्चाधिकारियों को भेजी भी है।
नई जेल के निर्माण में फंसा है पेंच
नई जेल के लिए राजकीय मेडिकल कॉलेज के बराबर में जमीन खरीदी गई है लेकिन कुछ हिस्से पर आकर पेंच अटक गया है। उस हिस्से के दो दावेदार बन गए हैं। उनमें एक पक्ष महेश है और दूसरा पक्ष दूसरे महेश की पत्नी है। एक महेश की मृत्यु हो चुकी है और दोनों पक्षों के बीच कोर्ट में मुकदमा चल रहा है, जिसका अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है। माना जा रहा है कि जब तक इस खेत का विवाद खत्म नहीं होगा, तब तक नई जेल का निर्माण शुरू होना मुश्किल है।
-जिला कारागार की क्षमता 529 की है। इससे तीन गुना बंदी हैं। नई जेल के लिए जमीन खरीदी जा चुकी है लेकिन एक खेत पर विवाद चल रहा है। उस खेत के दो दावेदार कोर्ट में पहुंच गए हैं। इसके बावजूद विवाद जल्द खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है।
आदित्य कुमार, जेलर