योगी सरकार बनते ही शहर जाम से मुक्त दिखाई दे रहा था। पुलिस भी उस वक्त सख्त दिखाई दे रही थी। तब लोगों में एक उम्मीद जगी थी कि सरकार बदलने के बाद वाकई परिवर्तन होने लगा है, लेकिन समय के साथ-साथ पांच महीने में सब कुछ बदल गया। बस, गुंडों और ठेकेदारों के आका बदलकर सब कुछ पुराने ढर्रे पर आ गया।
जिले के हर कोने में ऑटो, टेंपो, ई-रिक्शा और डग्गामार वाहनों के जाम लगाने के लिए पहले की तरह स्टैंड की बोली लगी गई। ठेकेदारों के गुंडों ने मनचाहे स्थानों पर वाहन खड़ा कर सवारियां भरने की खुली छूट दे रखी है। सार्वजनिक समारोहों में जो अफसर ये कहते नहीं थकते थे कि अगर अतिक्रमण होगा तो गरीबों का क्या होगा, सही बात तो यह है कि उनकी भावुकता गरीबों पर नहीं उगाही सिस्टम में जमे नेताओं-गुडों के प्रति है। हर माह करीब एक करोड़ से ज्यादा की कमाई ऑटो, टेंपो, मैजिक और बसों से जुटाकर इस सिंडीकेट के आकाओं का पेट भरवाते हैं। अब ये अफसर नेताओं के सिंडीकेट से बचने को भावुकता दिखाते हैं या खुद अपने हितों के लिए, यह तो जांच में भी साबित होना मुश्किल है। किस स्टैंड पर ठेकेदार के गुंडे और आवारा किस्म के आसमाजिक तत्व टेंपों चालकों से वसूली करते है। इस पर किसी के पास कोई जवाब नहीं था।