आठ दिन में नौ लोगों की मौत। सैकड़ों की संख्या में बुखार से पीड़ित बिस्तर पर पड़े हैं। लोग दहशत में हैं। आला अफसरों ने खुद की गर्दन बचाने के लिए नाम की रैपिड रिस्पांस टीम बना रखी है। लेकिन ये टीमें मरीजों को देखना तो दूर गांवों में जाती तक नहीं हैं। सरकारी अस्पतालों में बनी फीवर हेल्प डेस्क केवल नाम की हैं। हकीकत यह है कि स्वास्थ्य महकमे को अभी तक यह भी नहीं पता कि लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार बुखार आखिर है क्या। गरीबी, लाचार गांव वाले झोलाछाप के सहारे खुद को बचाने की कोशिश में हैं। ललबुझिया गांव में एक ही परिवार के चार लोगों की मौत इसी लापरवाही का नतीजा है। जिले में बुखार तो पिछले करीब एक महीने से फैला है। मगर बुखार से मौत 10 अगस्त को मूसाझाग इलाके के रायपुर गांव में हुई। वहां के शेर सिंह की बेटी भगवती को कई दिन बुखार आया और आखिर में उसकी जान चली गई। रायपुर के दो दर्जन लोग अब भी बुखार से पीड़ित हैं। 12 अगस्त को बुखार से दो लोगों की मौत हुई। इनमें सलारपुर ब्लाक के सिंगरौरा गांव के टोड़ीराम का बेटा ओमकार और जगत ब्लॉक के बाकरपुर गांव के जयपाल का चार वर्षीय बेटा विक्की शामिल है। बुखार से 16 अगस्त को हसनपुर गांव के प्रदीप के डेढ़ साल के बेटे जुगल किशोर की मौत हुई थी। बुखार का सबसे ज्यादा कहर 17 अगस्त की रात को बरपा। ललबुझिया गांव में गीता देवी, उसकी नवजात बच्ची और दो चचेरी ननद मिथलेश और कुसुमा देवी की मौत हुई। शुक्रवार 18 तारीख को जगत ब्लॉक के रायपुर गांव में बुखार से दूसरी मौत आठ साल की बच्ची स्वाति की हुई। गोरखपुर में बच्चों की मौत हुई तो पूरा प्रदेश हिल गया। मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री, भाजपा और विरोधी पार्टियों के नेता गोरखपुर जा पहुंचे। मगर यहां के बच्चों के मरने का किसी को मलाल नहीं है, न नेता, न ही अफसर। शनिवार देर शाम तक कोई भी मृतकों के परिवार वालों को ढाढ़स बंधाने नहीं पहुंचा। केंद्रीय मंत्री मंत्री संतोष गंगवार शुक्रवार को बदायूं एक कार्यक्रम में पहुंचे थे। उनके सामने बुखार से मरने का मामला भी उठा। मगर वह केवल कार्रवाई की बात कहकर लौट गए। प्रदेश सरकार के सिंचाई मंत्री धर्मपाल सिंह शुक्रवार की रात बदायूं पहुंचे। वह यहां विकास भवन में बैठक करने के बाद शनिवार को लौट गए। उन्होंने भी मृतकों के घर जाना मुनासिब नहीं समझा। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के अफसरों को भी ललबुझिया जाने की फुरसत नहीं है।