फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

 मनरेगा नहीं दे रहा काम, मजदूर पलायन को मजबूर

Sat, 25 Mar 2017 12:07 AM IST
मुन्ना लाल गुप्ता दातागंज।
विज्ञापन
मनरेगा - फोटो : यमुनानगर
विज्ञापन
- कई महीने से नहीं हो सका है मजदूरी का भुगतान
विज्ञापन

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में मजदूरों को रोजगार की गारंटी नहीं मिल रही है। योजना सुचारू होने के बाद भी ग्रामीण क्षेत्र से रोजगार की तलाश में हजारों की संख्या में लोग शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे हैं। काम की कमी और समय पर मजदूरी का भुगतान न होने के अलावा मजदूरों की दर बाजार से कम होने के कारण मनरेगा से मजदूरों का मोह भंग हो रहा है।
ऐसे में, गांवों से शहरी क्षेत्र में लोगों के पलायन को रोकने के लिए चलाई गई मनरेगा योजना पटरी से उतरी हुई चल रही है। दातागंज क्षेत्र का एक भी ऐसा गांव नहीं है, जहां से काम की तलाश में लोग शहर की तरफ न गए हों। ग्राम पंचायत सुखौरा की प्रधान कल्पना देवी ने बताया कि गांव के कम से कम तीन सौ लोग कार्य की तलाश में दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल और पंजाब राज्यों में चले गए है। मनरेगा में मजदूरों का करीब डेढ़ लाख रुपया फसा हुआ है। छह माह का समय गुजरने के बाद भी भुगतान नहीं हुआ है। सिसैया गुसाई ग्राम पंचायत से भी करीब चार लोग अन्य प्रांतों में मजदूरी करने गए हैं। यहां भी मनरेगा के मजदूरों का लगभग चार लाख रुपया फंसा है। प्रधान नन्ही दवी ने बताया कि चार माह बीतने के बाद भी भुगतान नहीं हो रहा है। 
विज्ञापन

ग्राम पंचायत सादुल्लागंज का भी यही हाल है। प्रधान सोनपाल सागर के मुताबिक दो सौ से अधिक लोग दूसरे राज्यों में मजदूरी कर रहे हैं। मनरेगा में 357 मजदूरों का रजिस्ट्रेशन है, सभी का काम मिलना मुश्किल है। इस ग्राम पंचायत में वर्ष 2014-2015 का दो लाख और 2016-2017 का एक लाख 80 हजार रुपया मजदूरों का अटका हुआ है। छोटी सी ग्राम पंचायत सेरहा पुख्ता से 75 से 80 लोग शहरों में मजदूरी कर रहे हैं। यहां मनरेगा में 72 मजदूर रजिस्टर्ड हैं। ग्राम प्रधान नीरज सिंह के मुताबिक, मनरेगा के मजदूरों का एक लाख 56 हजार रुपया बकाया है। छह माह का समय गुजरने के बाद भी भुगतान नहीं हुआ हैं। होली पर अपने पास से कुछ रुपय देकर मजदूरों का त्योहार कराया। कमोवेश हर ग्राम पंचायत का यही हाल है। नियम है कि मजदूरी का पसीना सूखने पहले उसकी मजदूरी मिल जानी चाहिए, लेकिन मनरेगा में कई सालें गुजर के बाद भी मजदूरों की मजदूरी के भुगतान का पता नहीं है। मनरेगा में मजदूरी करने पर न्यून्तम ढाई सौ रुपए  मिलते हैं। नियमानुसार मनरेगा में एक मजदूर को सौ दिन काम मिलना चाहिए, लेकिन वास्तविकता में 15 से 20 दिन का भी अनुपात नहीं बैठता है। मनरेगा में भुगतान की भी जटिल प्रक्रिया है। पहले रोजगार सेवक मास्टरसेल भरेगा फिर तकनीकी सहायक मेजरमेंट करेगा इसके बाद फीडिंग होगी। इसके बाद बीडीओ और पटल का बाबू डोंगल लगाएंगे, इसके एक हफ्ते बाद मजदूरी का पैसा मजदूर के खाते में जाएगा। बताते हैं कि बीडीओ और बाबू दोनों का एक साथ मिलना ही कठिन होता है। अधिकांश योजना के खाते में समुचित राशि नहीं होती है। ऐसे में सारी प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद भी मजदूर बैंक के चक्कर काटता रहता है। 
विज्ञापन


चुनाव की आचार संहिता लागू होने से मनरेगा के भुगतान में कुछ विलंब जरूर हुआ है। अब भुगतान की फाइलें तैयार कराई जा रही हैं। दो दिन बाद भुगतान होना प्रारंभ हो जाएगा। यह मजदूरों की मंशा है कि मनरेगा के कार्य करें या अन्य कहीं मजदूरी करें, जबरदस्ती तो नहीं की जा सकती है।
-सेवाराम चौधरी, बीडीओ, समरेर
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें