बदायूं। मिड-डे-मील बनाने के नाम पर रसोई गैस पर हर साल लाखों रुपये खर्च होते हैं। इसके बावजूद तमाम स्कूलों में आज भी मिट्टी के चूल्हों पर खाना बनाया जा रहा है। हालांकि विद्यालयों में लगातार गैस भरवाने के नाम रुपये को ठिकाने लगाने का खेल शिक्षा विभाग की मिली भगत से चल रहा है, जबकि स्कूलों में चूल्हे पर उपले (कंडे) की मदद से मिड-डे- मील बनवाया जा रहा है। बीएसए के निरीक्षण में कई बार उन्हें ही स्कूलों में चूल्हे पर खाना बनता हुआ मिला था, जिस पर उन्होंने नाराजगी व्यक्त करते हुए कार्रवाई की चेतावनी तक दे डाली थी। इसके बावजूद इसमें कहीं पर सुधार नहीं आया है।
परिषदीय स्कूलों में गरीब बच्चे पढ़ते हैं। वे कांवेंट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की तरह टिफिन नहीं ला सकते हैं। इसको ध्यान में रखते हुए शासन ने दोपहर का भोजन (मिड डे मील) देना शुरू किया था। इससे स्कूलों में बच्चों की संख्या में भी काफी सुधार आया। जिससे शासन लगातार ये योजना को संचालित कर रहा है। पहले स्कूलों में मिड डे मील चूल्हों पर बनता था, जिससे बच्चे धुएं में बैठ कर पढ़ने को मजबूर होते थे। इसको देखते हुए शासन ने सभी स्कूलों में गैस सिलिंडर और चूल्हा खरीदने के आदेश दिए, जिसके बाद में अधिकांश स्कूलों ने गैस सिलिंडर और चूल्हा खरीद लिया, लेकिन गैस सिलिंडर से मिड डे मील बनाने की योजना में अध्यापकों ने सेंधमारी कर दी।
आज भी कई विद्यालय ऐसे हैं, जहां पर सिलिंडर अभी भरवाया नहीं जा रहा है, जिस कारण आज भी स्कूलों में मिट्टी के चूल्हों पर खाना बनाया जा रहा है। जिले में 1815 प्राथमिक और 738 उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। इनमें से प्राथमिक विद्यालयों में 253427 छात्र-छात्राएं पंजीकृत हैं, जबकि उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 98136 छात्र-छात्राएं पंजीकृत हैं, जिन्हेें मिड डे मील योजना का लाभ दिया जाता है। बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा जिले में इस योजना पर करीब 21 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च होता है। इसमें करीब 41 लाख रुपये अकेले गैस के ऊपर खर्च होते हैं, लेकिन फिर भी स्कूलों में मिट्टी के चूल्हे पर मिड डे मील बनाया जा रहा है।
गैस की अपेक्षा उपले पड़ते हैं सस्ते
-जिले में तमाम विद्यालय ऐसे हैं जहां पर गैस सिलिंडर है, जो भरे रखे हुए हैं। उनका उपयोग तभी होता है, जब उन्हें किसी अधिकारी के आने की सुगबुगाहट होती है। वरना वह सिलिंडर कमरे में ही रखा रहता है। बाकी के समय में गैस की जगह पर चूल्हे पर ही मिड डे मील बनाया जाता है। उसमें भी अधिकतर जगह पर उपले पर ही खाना बनता है। क्योंकि वह गैस तो गैस, लकड़ी से भी सस्ता पड़ते हैं।
पिछले माह दिए 600 गैस कनेक्शन
-बीएसए रामपाल सिंह द्वारा लगातार विद्यालयों के निरीक्षण किए जा रहे हैं। इनमें तमाम जगहों पर उन्हें चूल्हे पर खाना बनाता हुआ मिला था। 21 अक्तूबर को बीएसए ने उझानी, सहसवान क्षेत्र का भ्रमण किया। इस दौरान भी उन्हें चूल्हे पर खाना बनता हुआ पाया था। जिसके बाद में बीएसए ने सभी विद्यालयों में गैस कनेक्शन देने के निर्देेश दिए हैं। विभाग के अनुसार पिछले दिनों 600 स्कूलों में गैस कनेक्शन दिए।
गैस कनेक्शन लेने के लिए विभाग मेें करना होता है आवेदन
-किसी भी विद्यालय में गैस लेने के लिए उन्हें एक प्रार्थना पर कार्यालय में देना होता है। उसकी जांच बीईओ करते हैं, इसके बाद विभाग द्वारा पूर्ति कार्यालय फाइल भेजी जाती है। जहां से नजदीकी गैस एजेंसी को गैस कनेक्शन देने के लिए निर्देश दिए जाते हैं। वहां से स्कूल के नाम गैस किताब जारी की जाती है।
सभी विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों को साफ निर्देश दिए हैं कि गैस सिलिंडर के माध्यम से मिड-डे-मील बनाया जाए। अगर किसी ने चूल्हे पर मिड-डे-मील बनाया तो कार्रवाई की जाएगी। इसको लेकर एमडीएम डीसी को निर्देशित किया है।
रामपाल सिंह राजपूत, बीएसएस