श्रीकृष्ण महलों में रहते थे और सुदामा अपनी टूटी-फूटी झोपड़ी में फिर भी उनका प्रेम निश्छल था।
उन्होंने बताया सुदामा की उनकी पत्नी ने गरीबी से तंग आकर पति से कहा तुम कहते थे कि तुम्हारे मित्र तो महलों में रहते हैं। वहां जाकर मदद क्यों नहीं मांग लेते। पहले तो सुदामा ने अपनी पत्नी को डांट लगाई। जब पत्नी सुदामा से नाराज हो गईं, तो सुदामा के मन में विचार आया कि मुझे अपने बाल सखा से से मिलना चाहिए। तब सुदामा ने अपने मित्र के यहां खाली हाथ नहीं जाने की बात कही तो उनकी पत्नी ने थोड़े चावल एक पोटली में बांध कर दे दिए। सुदामा उस पोटली को लेकर श्रीकृष्ण के महल पहुंचे। उन्हें इस हाल में देख सखा श्रीकृष्ण की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने खुद उनके पैरों को धोया। तब सुदामा अपनी पोटली को छुपाने लगे। श्रीकृष्ण ने उनसे पोटली लेकर उसमें से दो मुट्ठी चावल खाए और सुदामा को दो लोक का राज्य देने की घोषणा कर दी। ये मिलन और मित्रता अद्भुत थी।
कथावाचक रामनरेश शास्त्री ने भी कई प्रसंग सुनाए। इस मौके पर अनिल यादव, सुनील कुमार यादव, मनोज सिंह, सर्वेश वर्मा, पान सिंह, भूरे यादव, लल्ला सिंह, सुखपाल सिंह, भोले सिंह, विजेंद्र सिंह, अजय पाल सिंह मौजूद रहे।