तापमान में तेजी से गिरावट के साथ ही दो दिन से पड़े रहे तुसार (पाला) ने आलू की फसल को चपेट में लेना शुरू कर दिया है। पत्तियों के झुलसने की शुरुआत के साथ ही शुक्रवार को कई किसान कृषि वैज्ञानिकों के पास पहुंचे। हालांकि अभी झुलसा का प्रकोप कोई खास ज्यादा नहीं है लेकिन चार-छह दिन हालात ऐसे ही रहे तो सब्जियों के राजा को प्रभावित होने से रोकना मुश्किल हो जाएगा।
आलू पर मौसम की मार की शुरुआत भर से उत्पादकों के चेहरे पर शिकन झलकने लगी है। अच्छी पैदावार के संकेत के बीच वैज्ञानिकों को तापमान में तेजी के साथ गिरावट की भी उम्मीद कम ही थी। कृषि विज्ञान केंद्र पर पहुंचे मिहौना गांव के राजपाल और बुटला के हरीओम ने तुसार की वजह से झुलसा रोग की चपेट में आईं आलू की पत्तियों को भी दिखाया। तुसार का प्रकोप बढ़ने पर ऐसी दिक्कत पिछले सालों में भी आलू की फसल के सामने आती रही है लेकिन इस बार मौसम ने अचानक करवट बदलकर नुकसान की आशंका को बढ़ा दिया है। इस बार आलू का रकबा भी पहले के मुकाबले अधिक है। तुसार से गेहूं और सरसों की फसल को कोई खास नुकसान की आशंका नहीं है लेकिन सरसों में माहुं का प्रकोप हो सकता है।
झुलसा से बचाव को आलू पर करें रेडोमिल रसायन का स्प्रे
उझानी। कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो आलू की फसल को झुलसा रोग से बचाने के लिए सबसे अच्छा उपाय पांच ग्राम रेडोमिल रसायन का प्रति एकड़ रकबा के लिए दो सौ लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे किया जाए तो फसल को प्रभावित होने से बचाया जा सकता है। वैसे, आलू की फसल में नमी भी कम होने नहीं दी जाए। हल्की सिंचाई करके आलू की फसल पर तुसार के असर को कम किया जा सकता है। कोहरे से बचाव के लिए देसी तरीका फसल के आसपास धुआं करना भी मुफीद साबित होता है। अहम बात यह कि पत्तियां झुलसी दिखें तो यूरिया खाद का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
तुसार की वजह से आलू की पत्तियों के झुलसने की जानकारी किसानों के जरिए मिली है। इसे पिछेती झुलसा कहते हैं। किसानों को देसी और वैज्ञानिक तौर-तरीकों के बारे में भी अवगत कराया जा रहा है। धुआं करना और हल्की सिंचाई का इस्तेमाल भी फायदेमंद होता है।
- डॉ. संजय कुमार, कृषि वैज्ञानिक