- 1950 में आनंद और विद्याराम ने शुरू की थी परंपरा
- तीसरी पीढ़ी के हाथों में आई व्यवस्थाओं की कमान
होली पर निकलने वाला हुड़दंगियों का जुलूस 66 साल का हो गया है। वक्त के साथ जुलूस के स्वरूप में भी तब्दीली हुई है। जुलूस को छह दशक से ज्यादा हो चुके हैं। खास बात यह है कि जुलूस को लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ। हुड़दंगियों के जुलूस की कमान अब तीसरी पीढ़ी के हाथों में आ चुकी है।
आजादी के तीन साल बाद 1950 में आनंद रस्तोगी और विद्याराम पहली बार हुरियारों की टोलियों को साथ लेकर ढोल-नगाड़ों के साथ निकले। शुरुआत के सालों में जुलूस में दो-चार ठेले हुआ करते थे। धीरे-धीरे जुलूस विशाल होता गया। जुलूस में हाथी, घोड़े और ऊंटों को भी शामिल किया जाता था, लेकिन अब हाथी और ऊंट मिलते ही नहीं। अबीर-गुलाल और टेसू के फूलों की जगह रासायनिक रंगों ने ले ली है। जुलूस की कमान अब अवनेश वर्मा, महेंद्र वर्मा और अजयपाल के हाथों में है। इस बार भी जुलूस की तैयारियां मुकम्मल कर ली गई हैं।
वक्त के साथ कुछ बदलाव तो होते ही हैं। हम संतुष्ट इस बात से हैं कि जुलूस को 66 साल हो गए हैं। कभी किसी तरह का कोई विवाद नहीं हुआ।
- अवनेश वर्मा
हुड़दंगियों का जुलूस अब पहले के मुकाबले काफी बड़ा हो गया है। समय के साथ जुलूस का स्वरूप बदलना स्वाभाविक बात है। यह होना भी चाहिए।
- महेंद्र वर्मा
जिम्मेदारियां अब युवाओं के कंधों पर आ रही हैं। बुजुर्गों के मार्गदर्शन में काम हो रहा है। कुछ बदलाव समय के साथ जरूर हुए हैं, लेकिन जुलूस का मिजाज वही है।
-अजय पाल