मनरेगा के तहत काम करने वाले रोजगार सेवक और तकनीकी सहायकों को आठ से 10 महीने तक का मानदेय तक नहीं मिला था। इनके मानदेय निकालने को बीडीओ की भूमिका संदिग्ध रही। वह इसलिए कि भुगतान के साथ ही कहीं इनके काम का पूरा ब्योरा न तलब कर लिया जाए। यही वजह है कि भुगतान राशि 1.59 करोड़ आ जाने के बावजूद बीडीओ की डिमांड जारी हो गई है।
जिले में मनरेगा के तहत 783 रोजगार सेवक और 89 तकनीकी सहायक काम कर रहे हैं। वर्ष 2013-14 में इनमें तमाम रोजगार सेवक और तकनीकी सहायकों को मानदेय नहीं मिला था। इसके पीछे बीडीओ द्वारा इनका कार्यवृत बनाकर न भेजने की बात सामने आ रही थी। जब इन कारिंदों को मानदेय नहीं मिला, तो पहले इन लोगों ने अधिकारियों के चक्कर लगाने शुरू किए, लेकिन इस पर भी सुनवाई नहीं हुई तो हड़ताल और भूख हड़ताल का सहारा लिया। बाद में ये लोग डीएम से भी मिले। इस संबंध में लखनऊ तक लिखा-पढ़त हुई तब कहीं मानदेय के लिए बजट मिला। मनरेगा के इन कार्मिकों के कई त्योहार भी बिना मानदेय के ही बीत गए। 8-10 महीने का मानदेय न मिलने से इनको और इनके परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करना पढ़ा। रोजगार सेवक तो यहां कलक्ट्रेट की टंकी तक पर चढ़ गए थे। आंदोलन की उग्रता बढ़ने पर अधिकारियों का ध्यान उनकी आर्थिक समस्या पर गया। रोजगार सेवक और तकनीकी सहायकों का मानदेय का बजट आने पर इन्होंने संतोष की सांस ली है। इस भुगतान में एक फांस अभी यह अटकी है कि सभी बीडीओ से इनके कार्यवृत्त के साथ डिमांड मांगी गई है। शर्त है कि भुगतान तभी होगा जब बीडीओ की डिमांड आ जाएगी।
रोजगार सेवक और तकनीकी सहायकों का भुगतान आ जाने के बाद अब उनके भुगतान में कोई समस्या नहीं है। बीडीओ का कार्यवृत्त और डिमांड मिलना शुरू होती रहेंगी। इनका भुगतान होता रहेगा। रोजगार सेवकों को तो भुगतान मिलना भी शुरू हो चुका है। आगे भी भुगतान में कोई समस्या नहीं रहेगी।
- देवेंद्र प्रताप, उपायुक्त मनरेगा