बदायूं। हिंदी बोलने और लेखन में शुद्धता नई पीढ़ी के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। अच्छे स्कूलों में भी पढ़ाई करने वाले छात्र छात्राएं प्रार्थना पत्र लिखने, आवेदन भरने, खाता खुलवाने जैसे तमाम कामों में अटक जाते हैं। वह अपने विषय में पारंगत होते हैं पर हिंदी को लेकर ज्ञान अधूरा ही रहता है। ऐसे तमाम युवा फिल्म कलाकार, गीतकार, स्टेज परफार्मर के फॉलोअर हैं और उनके खाना, पहनने, स्टाइल आदि की नकल करते हैं। बावजूद फिल्मों में साफ और स्पष्ट संवादों पर गौर करके हिंदी नहीं सुधारते। शिक्षकों और विद्वानों का कहना है कि इस मामले में भी हमें अभिनेताओं से प्रेरणा लेनी चाहिए।
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हमारे युवा वर्ग के आदर्श सुपरस्टार, सुपर सिंगर होते हैं जोकि हिंदी में ही संवाद बोलते हैं और हिंदी में ही अपने गीत प्रस्तुत कर समा बांधते हैं। हमारे युवा बनना तो सुपर स्टार चाहते हैं पर जब बात आती है भाषा की तो वे हिंदी की बजाय अन्य भाषा का चयन करते हैं। हिंदी उन्हें पुरानी पीढ़ी की भाषा लगती है। आज जरूरत है कि हम अपने विचारों में परिवर्तन लाएं। बच्चे को मातृभाषा से प्रेम करना सिखाएं।
- डॉ. शुभ्रा माहेश्वरी, कवयित्री, असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी)
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हिंदी के प्रति उदासीनता के लिए काफी हद तक अभिभावक ही जिम्मेदार हैं। हम अपने छोटे बच्चे को भी कविता की जगह पोइम याद करवाते हैं और किसी मेहमान के सामने बच्चे से पूछते हैं कि तुम्हारी नोज कहां हैं, आइज कहां हैं, अपने ट्व्याज लाओ। यहीं से बच्चे में अंग्रेजी के प्रति रुझान और हिंदी के प्रति नीरसता का भाव आ जाता है। ऐसे में बड़े होकर वह हिंदी की उपेक्षा करेगा ही। स्थिति में सुधार की जरूरत है।
- सरला चक्रवर्ती, असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र
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एक भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है बल्कि यह हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक, संप्रेषक और परिचायक भी हैं। नई पीढ़ी में हिंदी भाषा के प्रति ज्ञान व रुझान कम देखने को मिलता है। वे फिल्मी जगत के सितारों व गायकों के अभिनय और उनके लुक्स के तो फैन होकर उसे अपना लेते हैं पर उनकी शुद्ध साफ हिंदी भाषा को नहीं सीख पाते। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि हम नई पीढ़ी का हिंदी भाषा के प्रति रुझान व सम्मान बनाए रखने में सहायता करें।
- प्रगति सक्सेना, असिस्टेंट प्रोफेसर, गृहविज्ञान
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सभी देश पहले अपनी भाषा और फिर विदेशी भाषा सीखते हैं। विचार, चेहरे के हावभाव, हाथ व हाथों की अंगुलियां चलना यह सब विचार से ही उत्पन्न होते हैं। राष्ट्र को सशक्त बनाना है तो हिंदी के लिए सख्त नियम लाना होगा। इससे सांस्कृतिक धार्मिक एकता को बल मिलेगा । बच्चों को भी अपने आदर्श इसी तरह के बनाने चाहिए जो हिंदी को बढ़ावा देते हैं। फिल्म उद्योग भी हिंदी मातृभाषा की देन है।
- डॉ. ममता नौगरैया, वरिष्ठ कवयित्री