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काम करना चाहते हैं, लेकिन मुश्किलों का सामना भी कर रहे डॉक्टर

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बदायूं। जिले में आज भी कुछ डॉक्टर ऐसे हैं, जो मरीजों को ठगते नहीं बल्कि उनका इलाज करते हैं। उनकी फीस सामान्य है, जहां गरीब से गरीब व्यक्ति उनकी फीस देकर अच्छा इलाज करा सकता है। बावजूद इसके उनका सामना ऐसे लोगों से भी होता है, जो वास्तव में सरकारी योजनाओं का लाभ फर्जी तौर पर लेना चाहते हैं। इससे कभी-कभी उनके सामने भी मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं।
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डॉ. शरद कुमार गुप्ता के मुताबिक उनका हॉस्पिटल आयुष्मान भारत योजना के तहत जुड़ा था। डॉ. गुप्ता आईएमए के सचिव भी हैं। उन्होंने बताया कि आयुष्मान भारत योजना केंद्र सरकार की अच्छी पहल है। इस योजना के तहत उन गरीबों के लिए लाभ मिल सकता है, जो वास्तव में इलाज के लिए पैसे नहीं जुटा पाते लेकिन इसमें कुछ ऐसी बातें सामने आईं हैं जो हैरान कर देने वाली हैं। अब तक उनके पास जो भी लोग आए, उनमें कुछ ऐसे लोग भी थे, जो बीमार नहीं थे। उन्होंने कहा था कि गोल्डन कार्ड के तहत प्राइवेट हॉस्पिटल में ओपीडी चार्ज देना पड़ेगा। अगर मरीज भर्ती होता है तो उन्हें चार्ज नहीं देना पड़ेगा, इसलिए वे सामान्य बीमार होने पर भी भर्ती होना चाहते थे। दो लोग ऐसे आए जो इस योजना के तहत फर्जी ऑपरेशन दिखाकर डॉक्टर को होने वाले भुगतान का लालच देते हुए हिस्सा मांग रहे थे।
वह कहते हैं कि ऐसे लोग उन लोगों का हक मार रहे हैं, जिन्हें वास्तव में गोल्डन कार्ड की जरूरत है। ---------------------------

तीन माह बाद हो रहा भुगतान, सिर्फ सर्दियों में होते हैं आपरेशन
आयुष्मान भारत योजना से जुड़े नैना आई स्पेशलिस्ट डॉ. रितुज चंद्रा ने बताया कि वह अब तक करीब पचास लोगों के आंखों के ऑपेरशन कर चुके हैं लेकिन उनके यहां आंखों के ऑपरेशन सिर्फ सर्दियों में होते हैं। इससे मरीज को अधिक फायदा रहता है। जब से योजना शुरू हुई है। तब से ऑपरेशन कर रहे हैं। कभी कोई दिक्कत नहीं आई। इतना जरूर है कि भुगतान तीन माह बाद मिलता है। कभी किसी मरीज के कागजों में कमी रह गई हो तो बात अलग है।
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इनकी भी सुनो
ब्लॉक दातागंज क्षेत्र के ग्राम डहरपुर निवासी रामदास पुत्र ओमप्रकाश प्राइवेट गाड़ी चलाकर परिवार का गुजारा करते हैं। उनके नाम एक बिसवा जमीन भी नहीं है। पिता 75 साल के हो चुके हैं। मां सुखदेवी बीमार रहती हैं। पत्नी सरला देवी और तीन बच्चे हैं। वह अपना परिवार कैसे चला रहे हैं। यह तो वही जानते हैं। अमर उजाला को फोन करके रामदास ने बताया कि उनके गांव में बड़े-बड़े लोगों के गोल्डन कार्ड बन चुके हैं लेकिन उनका आज तक नहीं बना। कभी कोई मुसीबत आ जाए तो उनके पास बेचने को जमीन भी नहीं है।

उझानी में सराफा व्यापारियों के बने हैं गोल्डन कार्ड
एक तरफ गरीब आदमी दो जून की रोटी के लिए कड़ी मशक्कत कर रहा है। उनको आयुष्मान भारत योजना के तहत लाभ नहीं मिल रहा है। तो वहीं दूसरी ओर उझानी में ऐसे लोगों के भी गोल्डन कार्ड बना दिए हैं, जो सराफ हैं तो वकील। स्वास्थ्य विभाग ने कभी उनके कार्ड तक चेक नहीं किए। उन्होंने स्वयं बनवाए हैं या फिर विभाग सरकार की आंखों में धूल झोंक रहा है।

वर्ष 2011 में जो सर्वे हुआ था। उसके मुताबिक ही गोल्डन कार्ड बन रहे हैं। अगर ऐसे लोगों के कार्ड बन गए हैं, जो वास्तव में धनाढ्य हैं तो जांच के दौरान ऐसे कार्ड निरस्त कर दिए जाएंगे।
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-डॉ. मंजीत सिंह, प्रभारी सीएमओ
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