बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की सहसवान परियोजना में जहां हॉटकुक्ड का लाखों रुपया हजम कर लिया गया, वहीं कई आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं की नियुक्ति फर्जी़ तरीके से कर दी गई। बैंक खातों के आधार पर इन नियुक्तियों की पोल खुली है। छह फर्जी नियुक्तियों की जांच खुद डीपीओ निर्मला शर्मा कर रही हैं। उनका कहना है कि नियुक्तियों का पता लगाने के लिए पिछला रिकार्ड देखा जाएगा।
वर्ष 2011 से बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग में आंगनबाड़ी वर्कर, सहायिकाओं की नियुक्ति पर रोक चल रही है। बावजूद इसके तमाम आंगनबाड़ी, सहायिकाओं के खाते नए खोले गए और उनके खातों में मानदेय भी जाने लगा। इससे इनकी फर्जी नियुक्ति का भंडाफोड़ हुआ है। वर्ष 2006 के विभागीय अभिलेखों को गायब करने के बाद तमाम नई नियुक्तियों को इसी वर्ष में अंजाम दिया गया। आज तक इनका मानदेय निकलता रहा है।
सहसवान परियोजना में यही नहीं हुआ है। फर्जी नियुक्ति के कई मामले लंबित पड़े हैं। यही नहीं नौ लाख से अधिक हॉटकुक्ड योजना का घपला भी जांच में पेंडिंग पड़ा हुआ है। इस घपले के खुलने के बाद सीडीपीओ और एक बड़ा बाबू कार्रवाई के घेरे में भी आ चुका है।
आठ महीने से नहीं दिया जा रहा मानदेय
जिला परियोजना अधिकारी निर्मला शर्मा सहसवान में मात्र छह आंगनबाड़ी सहायिकाओं की नियुक्ति की जांच कर रही है। पिछले आठ महीने से इनका मानदेय भी नहीं दिया जा रहा है। दूसरी ओर कई ऐसी फर्जी नियुक्ति वाली आंगनबाड़ी और सहायिकाएं अपना मानदेय निकाल रही हैं।