अपने फन का हर कलाकार माहिर होता है। ऐसे ही फनकार हैं फकीरी मोहम्मद, जो अपनी ढोला गायकी से समां बांध देते हैं। जब उनकी गायकी शुरू होती है, तो श्रोता बस टकटकी लगाए एकाग्रचित उनको सुनते हैं।
कस्बे के शर्की बस्ती में सपा नेता राजेश कश्यप के घर के पास दस दिन से ढोला चल रहा था। यहां संभल जिले के गांव रम्पुरा से आए ढोला गायक फकीरी मोहम्मद रोजाना नई कहानियों के साथ अपने फन का मुजाहिरा कर रहे थे। उनको सुनने के लिए कस्बे के साथ साथ आस-पास गांव के लोग भी जुटते थे। क्षेत्र के राजेश कश्यप, रोहताश कश्यप , प्रवेेंद्र शर्मा, मनोज पाराशरी का कहना है कि मोहम्मद आज भी लोक कला को जिंदा रखे हुए हैं। उनकी लोक गायकी में जो मिठास है, वह आज के दौर के गायकों में नजर नहीं आती। लोक गायकी हमें हमारे इतिहास से भी जोड़ती है।
हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल है मोहम्मद का ढोला
उघैती। लोक गायक फकीरी मोहम्मद का ढोला हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल भी है। वह अपनी गायकी में सद्भाव का संदेश देते हैं। मोहम्मद सन 1947 से इस विधा को सहेजे हुए हैं। सारंगी उनका प्रमुख साज हैं। जब उनकी अंगुलियां उस पर थिरकती हैं, तो श्रोता झूम उठते हैं। मोहम्मद बताते हैं कि उन्हें इस विधा से ही प्यार है। इसी के चलते उन्होंने आज तक शादी नहीं की। जीवन यापन करने का यही सहारा भी है। उनकी फनकारी के चर्चे कई जिलों के गांवों में सुनने को मिल जाते हैं।