‘ना खुदा ही मिला न बिसाले सनम...न इधर के रहे न उधर के रहे।’ ये पंक्तियां इन दिनों उन भूमिहीन किसानों पर सटीक बैठ रही हैं, जिन्होंने पेशगी अथवा बटाई पर खेती की थी। अपनी जुड़ी-गठी रकम भी लगाई थी। कुछ ने उधार लेकर भी फसल तैयार करने की हिम्मत जुटाई थी, लेकिन मौसम की ऐसी मार पड़ी कि वे कहीं के नहीं रहे। लाभ की आस में गांठ की रकम भी चली गई। क्षतिपूर्ति का सर्वे हुआ तो मुआवजा खेत स्वामी को मिलेगा, सो ये किसान टूटे हुए हैं। अब तो उनको दो वक्त की रोटी के भी लाले हैं। दरअसल, इनको मदद की दरकार है, लेकिन ये नियमत: मुआवजे की सूची से बाहर हैं।
वजीरगंज से करीब साढ़े तीन किमी दूर गांव रामडांडी है। यहां भी कुदरत का कहर बरपा है। मार्च-अप्रैल में चलीं तेज हवाओं के साथ पड़े ओले और बारिश ने ऐसे मेहनतकशों को अधिक नुकसान पहुंचाया है, जो दूसरों के खेतों पर हल चलाकर अपने सपनों की फसल उगाते थे। अब उनके सपने धराशायी हो चुके हैं। उनके जख्मों पर मरहम लगाने वाला कोई नहीं। कारण, मुआवजा देने में नियमों की बंदिश है।
अब घर का खर्च कैसे चलेगा?
कच्चे मकान में तीन अविवाहित बच्चों के साथ गुजर-बसर कर रहे सेवाराम कहते हैं कि उन्होंने 18 बीघा जमीन बटाई पर ली थी। उनका करीब नौ हजार रुपया गेहूं की फसल तैयार करने में खर्च हो गया। बरसात-हवा से करीब 14 बीघा फसल बर्बाद हो गई है। जो बची है, उसमें भी दाने खराब हैं। सर्वे हो गया है, लेकिन मुआवजा जमीन के मालिक को मिलेगा। अब घर का खर्च कैसे चलेगा? सोच-सोचकर परेशान हैं।
..अब तो जाकर मजूरी करनी होगी
रामडांडी के भगवान दास की भी हालत इनसे मिलती-जुलती है। उन्होंने 10 हजार पेशगी देकर गांव के रामेश्वर दयाल का तीन बीघा खेत ठेके पर लिया था। पांच हजार रुपये लागत लग गई। फसल चौपट हो गई। अब खेत मालिक मुआवजे की रकम में उन्हें हिस्सेदार बनाने को तैयार नहीं। दो बच्चे शादीशुदा हैं। बोले, परिवार का खर्च चलाने को अब तो बाहर जाकर मजूरी करनी होगी।
कैसे खिंचेगी गृहस्थी की गाड़ी
खेमचंद की हालत और भी खराब है। उन्होंने तीन बीघा खेत नौ हजार रुपये पेशगी पर लिया था। दो बीघा जमीन तीन क्विंटल छमाही गेहूं पर तय की थी। फसल तैयार करने में जमा भी रकम लगा दी। इस बार पैदावार अच्छी होने की उम्मीद थी, लेकिन आंधी-पानी ने अरमानों पर पानी फेर दिया। दो बेटियां और एक बेटे के साथ रह रहे खेमचंद ये सोचकर दुखी हैं कि अब गृहस्थी की गाड़ी कैसे खिंचेगी। मदद को उन्हें दूर तक कोई आस नहीं दिख रही।
ये यहां की ही नहीं पूरे प्रदेश की समस्या है। इसके लिए शासन से ही कोई योजना बने तो मदद हो सकती है। नियमत: बटाईदार और पेशगी पर खेती करने वालों को मुआवजा देने का कोई प्रावधान नहीं है। हां, अगर खेत स्वामी चाहे तो मानवीय दृष्टिकोण से मुआवजे से अपने बटाईदार की मदद कर सकता है। -शंभूनाथ, जिलाधिकारी