बदायूं/दबतोरी। खुरपका और मुंहपका बीमारी से पशुओं को बचाने के लिए टीकाकरण के बाद भी जिले में पशुओं में यह बीमारी तेजी से फैल रही है। फिर से टीकाकरण शुरू होने में एक महीने का वक्त बाकी है। उससे पहले ही दर्जनों की संख्या में पशुओं की मौत हो चुकी है और हजारों की संख्या में बीमार हैं। सरकारी पशु अस्पतालों में दवाएं न होने के कारण पशु पालकों को निजी डॉक्टरों के साथ झोलाछाप की शरण में जाना पड़ रहा है।
हाल ही में आसफपुर ब्लॉक के गांव बीधा नगला में पशुओं में भयंकर तरीके से संक्रामक बीमारी फैली है। कई पशुओं की मौत हो चुकी है और दर्जनों बीमार हैं। पशुओं में फैली बीमारी के बाद गांव के लोगों से बात की गई तो पता लगा कि गांव में टीकाकरण हुआ ही नहीं। जब पड़ताल की गई तो सच्चाई सामने आई कि जिन पशुओं का टीकाकरण किया गया है उनको भी संक्रामक बीमारियों का खतरा है। दरअसल, जो वैक्सीन दी गई है वही अधोमानक है। पशु चिकित्सा विभाग के अधिकारियों का दावा है कि स्थिति नियंत्रण में है। वहीं दूसरी ओर जिले में कोई ब्लॉक ऐसा नहीं है जहां पशुओं में बीमारियों का प्रकोप न हो। सबसे ज्यादा स्थिति आसफपुर और सालारपुर ब्लॉक के गांवों की खराब है। हाल ही में कुंवरगांव के अहरुइया गांव में भी एक ही दिन में सात पशुओं की मौत हो चुकी है। यहां अब भी दर्जनों पशु बीमार हैं। कुंवरगांव के ही गंज में भी सैकड़ों की संख्या में पशु बीमारी की गिरफ्त में हैं।
बीमारी से पशुओं की मौत हो लेकर पशु पालकों में हड़कंप है। जो पशुपालक अपने पशुओं का टीकाकरण करा चुके थे उनको अब तक यह नहीं पता था कि पशुओं को दी गई वैक्सीन की गुणवत्ता खराब थी। अब वैक्सीन की गुणवत्ता की बात सामने आने के बाद वह भी परेशान हैं। ऐसे में सरकारी पशु अस्पतालों की बदहाली के बीच निजी डॉक्टरों और झोलाछाप की चांदी हो रही है।
पशुओं के वैक्सीनेशन में भी होता है खेल
पशु चिकित्सा विभाग पशुओं के वैक्सीनेशन में भी खेल करता है। शासन हर साल पशुओं के टीकाकरण पर मोटा बजट खर्च करता है। इसके बाद भी स्थानीय स्तर पर आंकड़ेबाजी कर दी जाती है। साल में दो बार एफएमडी और एक बार एचएस वैक्सीन दी जाती है। एफएमडी पशुओं को खुरपका और मुंहपका से जबकि एचएस गलाघोंटू बीमारी से बचाती है। वैक्सीनेशन के बीच कम से कम 20 दिन का अंतर भी होना चाहिए। ऐसे में पशु चिकित्सा विभाग आंकड़ेबाजी कर पशुपालकों को गुमराह कर देता है।