बदायूं। मेडिकल कॉलेज में दवाओं के नाम पर कमीशनखोरी का खेल चल रहा है। डॉक्टर बाहर मेडिकल स्टोर की दवाएं लिख रहे हैं। इससे मरीजों पर आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
राजकीय मेडिकल कॉलेज में आने वाले मरीजों को दवा खरीदने के लिए अपनी जेब ढीली करनी पड़ रही है। 90 फीसदी दवाएं अस्पताल में उपलब्ध हैं, बावजूद इसके एक कंपनी की दवा की पर्ची मरीजों बाहर से खरीदने के लिए थमाई जा रही है। दुकानदार इसके पीछे कमीशन का खेल बता रहे हैं। अगर गलती से मरीज किसी दूसरी कंपनी की दवा खरीदकर ले जाता है तो डॉक्टर उस दवा को अनुपयोगी बताकर वापस करा दे रहे हैं।
मंगलवार को जरीफनगर क्षेत्र से दवा दवा लेने आए किशनपाल सिंह को एक पर्ची पर लिखकर बाहर की दवा मंगाई गई। जब परिजन बाहर की दवा लेने पहुंचे तो दुकानदार ने उसी फार्मूले की दवा दूसरी कंपनी की दे दी। जब वे उस दवा को लेकर भीतर पहुंचे तो डॉक्टर ने उसे लौटा दिया, कहा कि जो दवा पर्ची में लिखी है उसी को लेकर आओ, उसमें सॉल्ट की पूरी मात्रा होती है।
तीमारदारों का दर्द
दवा के नाम पर थमा दिया बाहरी दवा का पर्चा
सांस लेने में परेशानी होने पर मरीज काे भर्ती कराया है। सोचा था कि सरकारी मेडिकल कॉलेज है तो इलाज मुफ्त में हो जाएगा, लेकिन यहां तो प्राइवेट से भी अधिक महंगा इलाज है। डॉक्टर बाहर की दवाएं लिख रहे हैं। दो दिन में करीब दो हजार की बाहर की दवा खरीदी है। अंदर तो दवा के नाम पर खानापूर्ति हो रही है।- शिवानी, उसहैत
मेडिकल से आठ सौ रुपये की खरीदी दवा
राजकीय मेडिकल कॉलेज नाम का ही सरकारी है। गंभीर हालत में जिला अस्पताल से मरीज को यहां रेफर किया गया। पहले लगा कि मेडिकल कॉलेज है तो इलाज भी बेहतर होगा, लेकिन यहां की व्यवस्था देखकर तो लगा कि जिला अस्पताल ही अच्छा है। यहां तो देखते ही डॉक्टर ने पर्ची थमाई और कहां बाहर से दवा लाओ। आठ सौ रुपये की दवा मेडिकल से लानी पड़ी है।- शीला देवी, गांव चमारी
बाहर की दवा लिखने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। मेडिकल कॉलेज में दवाओं की कोई कमी नहीं है। इसके बाद भी अगर कोई डॉक्टर बाहर से दवा लिख रहा है तो शिकायत मिलने पर जांच कराके कार्रवाई की जाएगी।- डॉ. अरुण कुमार, प्राचार्य राजकीय मेडिकल कॉलेज
शीला।