बदायूं/उझानी। पितृपक्ष पूर्णिमा पर आस्था की डुबकी लगाने के बाद पितरों को जलदान करने के लिए कछला गंगाघाट पर हजारों की संख्या में उनके अपने शनिवार को जुटेंगे। जलदान कुश धारण कर काले तिल और जौ के साथ किया जाए तो पितर भी खुश होते हैं।
पितरों के प्रति आस्था से सराबोर पितृपक्ष (कनागत) की पूर्णिमा पर जलदान करने के लिए गंगाघाट पर बदायूं, बरेली ही नहीं, बल्कि कासगंज, हाथरस और मथुरा से भी लोग पहुंचते हैं। जलदान के दौरान खासी भीड़ जुटने की संभावना के तहत कछला घाट पर इंतजाम भी किए गए हैं। गंगा में हालांकि जलस्तर अधिक नहीं है, फिर भी पिछले दिनों बाढ़ के दौरान बेतरतीब गहराई से बचने के लिए श्रद्धालुओं को सजग रहना होगा। गंगा के चारों घाट पर धार्मिक धार्मिक मान्यता के अनुसार मंत्रोच्चार के बीच जलदान कराने को पुरोहित भी मौजूद रहेंगे। पुलिस और नगर पंचायत प्रशासन की ओर से एक दिन पहले ही व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दे दिया गया।
पूर्णिमा पर जलदान को लेकर आचार्य प्रवीण शर्मा कहते हैं कि पितृपक्ष में ही सभी पितर पृथ्वी लोक में पधारते हैं। उन्हें तृप्त करने के लिए धार्मिक रीत-रिवाज का पूरी तरह पालन करना चाहिए। जलदान करते समय उंगलियों में कुश धारण करें, फिर जौ और काले तिल के साथ जलदान किया जाए तो पितर तृप्त हो जाते हैं। पितरों से उनके अपनों को आशीर्वाद भी अपार मिलता है।
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ऐसे करे श्राद्ध
पं. गिरीश शर्मा के अनुसार, श्राद्ध कर्म वाले दिन नित्य कर्म के बाद व्यक्ति गंगा स्नान या गंगा जल से स्नान करें। उसके बाद में सफेद वस्त्र पहनकर, पीपल देवता पर जल अर्पित करें और पितृ स्त्रोत का पाठ करें। ब्राह्मण द्वारा संकल्प लेकर दक्षिण मुखी होकर श्राद्ध कर्म प्रेम पूर्वक करें। हाथ में कुश, तिल, जल लेकर अंगूठे से जलांजलि लेकर तर्पण कराएं। भोजन पितृ देव के स्वादानुसार हो, ब्राह्मण देव को पितृ देव समझकर भोजन कराएं। दान दें और आशीर्वाद लें। ध्यान रहे भोजन में सफेद वस्तु और मिष्ठान अवश्य हो। ब्राह्मण भोजन से पहले पांच बलि देना अत्यावश्यक है। इसमें गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी और देवता को मिट्टी और पत्तल के पात्र में भोजन दिया जाता है। अंत में ब्राह्मण को दान दक्षिणा देकर सम्मान के साथ विदा करें।
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17 को नहीं होगा श्राद्ध
पं. गिरीश शर्मा के अनुसार श्राद्ध 10 सितंबर से शुरू होकर 25 तक चलेंगे। इसमें 10 को पूर्णिमा और प्रतिपदा का श्राद्ध होगा, 11 को द्वितीया का, 12 सितंबर को तृतीया का, 13 सितंबर को चतुर्थी का, 14 सितंबर को पंचमी का, 15 सितंबर को षष्ठी का, 16 सितंबर को सप्तमी का, 18 को अष्टमी का, 19 को नवमी तिथि का, 20 को दशमी तिथि का, 21 को एकादशी तिथि का, 22 को द्वादशी तिथि का, 23 को त्रयोदशी तिथि का, 24 को चतुर्दशी और 25 को अमावस्या का श्राद्ध होगा, लेकिन 17 को कोई श्राद्ध नहीं होगा।