कोतवाली क्षेत्र के गांव कनकपुर निवासी विद्याराम के मासूम बेटे विकेश और जितेंद्र नौ जनवरी 2013 को गायब हो गए थे। काफी समय तक विद्याराम के घर फिरौती के लिए पत्र आते रहे। परिवार के लोग बच्चों को तलाश करने जहां पर भी जाते थे, उनके साथ विद्याराम का सगा भाई महीपाल होता था। फिरौती का पत्र भी विद्याराम ने दिया था। दोनों बच्चों के गायब होने की सूचना से पुलिस भी परेशान थी। पुलिस को चाचा महीपाल पर कुछ शक हुआ, तब पुलिस ने 22 जनवरी 13 को जब महीपाल से सख्ती से पूछताछ की, तो भेद खुला।
उस वक्त पुलिस को महीपाल ने बताया था कि उसने ही दोनों बच्चों को मार डाला है। उसकी शिनाख्त पर पुलिस ने दोनों बच्चों की लाश उसी के घर से बरामद की थीं। उसने दोनों की लाश जानवरों के बंधने वाले स्थान पर नीचे गाड़ दी थीं। महीपाल ने पुलिस को बताया था कि उसने दोनों बच्चों को इसलिए मारा था कि उसके भाई विद्याराम ने उसकी जमीन की बेईमानी कर ली है। 18 नवंबर 2014 को इस चर्चित और सनसनीखेज मामले में बदायूं जिला न्यायालय ने आरोपी महीपाल को फांसी की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ महीपाल ने हाईकोर्ट की शरण ली। गत 18 अगस्त 2015 को हाईकोर्ट ने महीपाल को इस चर्चित मामले से पूरी तरह बरी कर दिया।
न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट जाऊंगा: विद्याराम
दातागंज। बच्चों के पिता विद्याराम का कहना है कि हाईकोर्ट ने उसके भाई को बरी कर दिया है। यह उसने सुना है। बोले वह उसे सजा दिलाने के लिए अब सुप्रीम कोर्ट की शरण लेंगे। बोले, उन्हें भूरा भरोसा है कि सुप्रीम कोर्ट से आरोपी को सजा जरूर मिलेगी। वह किसी भी कीमत पर खामोश नहीं बैठेंगे।
यही बच्चे लाते थे चाचा के लिए खाना
दातागंज। हाईकोर्ट के फैसले के बाद से सकते में आए परिजनों ने बताया कि जब कभी महीपाल की पत्नी घर पर नहीं होती थी, तब यही बच्चे अपने चाचा को खाना ले जाते थे। इन मासूमों की हत्या के बाद से गांव वालों में भी गुस्सा देखा गया था। अब हाईकोर्ट से आरोपी के बरी होने से गांव वाले भी सकते में हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का ये है फैसला
बदायूं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति प्रत्यूश कुमार ने अपने फैसले में आरोपी को बरी करते हुए कहा कि विचारण कोर्ट ने सजा करने में गंभीर चूक की है। हाईकोर्ट ने फांसी के आदेश को खारिज करते हुए अपील का निस्तारण किया। आरोपी महीपाल को बरी कर दिया। न्यायमूर्ति ने आरोपी महीपाल के अधिवक्ता (न्यायमित्र) को 11500 रुपये दो माह में रजिस्ट्री द्वारा भेजने के आदेया भी दिए हैं।
विधि विशेषज्ञों की राय
बदायूं। जिला बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राजेश कुमार सिसौदिया का कहना है कि संभवत: ठोस सबूत न होने के चलते हाईकोर्ट ने ये निर्णय लिया है। वरिष्ठ अधिवक्ता स्वतंत्र प्रकाश गुप्ता का कहना है कि सेशन कोर्ट से फांसी की सजा के मामले कन्फर्मेशन के लिए हाईकोर्ट जाते हैं। साथ ही अपील भी की जाती है। हाईकोर्ट इसे तत्काल संज्ञान में लेकर अपने फैसले सुनाता है। ये केस नया नहीं है। गुन्नौर के एक ऑनरकिलिंग के मामले में ऐसे ही छह लोगों को सजा सुनाई गई थी। बाद में हाईकोर्ट ने उनको दोषमुक्त कर दिया था।