सन् 2007 में बड़े गाजे-बाजे के साथ डीपी द्वारा शुरू किया गया राष्ट्रीय परिवर्तन दल अब जिले में भी वजूद तलाश रहा है। हालत ये है कि पार्टी के आला पदाधिकारियों को भी पता नहीं है कि संगठन के पदाधिकारी कौन हैं और जिले में संगठन का अता-पता क्या है। कुल जमां ये कि जिले में पार्टी का नामलेवा नहीं बचा है।
कई दलों में रहने के दौरान चंद वर्षों पहले जब डीपी की सियासी पकड़ ढीली होने लगी तो उन्होंने सन् 2007 में राष्ट्रीय परिवर्तन दल का गठन किया था। और खुद ही इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर राजनीतिक जमीन तैयार करनी शुरू कर दी थी। इसी वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में रापद से आसपास के जिलों में भी प्रत्याशी उतारे गए, लेकिन सफलता उनको और उनकी पत्नी को बदायूं जिले में ही मिली। सहसवान से वह खुद और बिसौली से उनकी पत्नी उमलेश यादव जीतीं। इसी दौरान पत्नी पर पेड न्यूज छपवाने का आरोप लगा, जिसे चुनाव आयोग ने गंभीरता से लिया। इसके चलते उमलेश यादव की सदस्यता समाप्त कर दी गई। ये चुनावी इतिहास का पहला मामला था। इसके बाद अकेले पड़ गए डीपी ने बसपा में अपनी पार्टी का विलय का लिया, लेकिन बसपा ने कुछ दिनों बाद इनसे किनारा कर लिया। 2012 के विधानसभा चुनाव में डीपी यादव ने सहसवान विधानसभा से फिर किस्मत आजमाई, लेकिन उनको शिकस्त मिली। अब रापद की हालत ये है कि पार्टी को खुद ये नहीं पता है कि संगठन के पदाधिकारी कौन हैं। जिले में भी संगठन का अता-पता नहीं है।
डीपी को क्षेत्र में इसलिए भी जाना जाता है क्योंकि उन्होंने समाजवादी पार्टी जब बदायूं को अपना गढ़ बनाने के फिराक में थी, तब वे यहां उसे तोड़ने के राजनीतिक गुर आजमा रहे थे। उन्होंने पिछले डेढ़ दशक में सपा को काफी झटके दिए और बड़ी राजनीतिक पार्टियों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। डीपी ने बदायूं की राजनीति संभल लोकसभा सीट के रास्ते पकड़ी। उस समय बदायूं के गुन्नौर और बिसौली विधानसभा क्षेत्र संभल लोकसभा क्षेत्र में ही हुआ करते थे।
अपनी राजनीतिक विरासत आगे वढ़ाने के लिए उन्होंने वर्ष 2002 में अपने बड़े पुत्र विकास यादव को बिसौली विधानसभा से चुनाव मैदान में उतारा, जो केवल 900 वोटों से चुनाव हार गए। विकास ने जेल से ही चुनाव लड़ा था। छोटा बेटा कुणाल यादव सियासत में दखल नहीं रखता, लेकिन उनको यदु चीनी मिल का डायरेक्टर बनाकर यहां से ताल्लुक कायम रखा गया है।
फैसले से संतुष्ट नहीं, करेंगे प्रोटेस्ट
बदायूं। भाटी हत्याकांड में डीपी यादव और उनके साथियों को सजा सुनाए जाने के फैसले से उनके परिवारीजन संतुष्ट नहीं हैं। उनके साले और पूर्व एमएलसी भारत सिंह का कहना है कि इस फैसले के खिलाफ वह अपील करेंगे। बोले, न इस केस में कोई रिकवरी हुई, न गवाह और न ही वह गाड़ी बरामद हुई जिसे बाद में जला देने की बात कही गई है।
डीपी का सफरनामा
इससे पूर्व 1996 के लोकसभा चुनाव में भी बसपा का दामन थामकर संभल लोकसभा क्षेत्र से वे पहली बार सांसद बने। 1998 में फिर चुनाव हुए। तब सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव भी संभल से मैदान में उतरे थे। उनके आगे दाल नहीं गली और चुनाव हार गए। इसके बाद भाजपा से निकटता के सहारे 1999 में डीपी राज्यसभा सदस्य बने। इसके बाद 2004 में वे संभल में पराजित हो गए। वहीं 2009 में बदायूं लोकसभा क्षेत्र से सपा के धर्मेंद्र यादव से उन्हें मुंहकी खानी पड़ी।
बदायूं में रहा है डीपी का असर
बदायूं। डीपी ने बदायूं में पिछले विधान परिषद चुनाव में अपने भतीजे जितेंद्र सिंह यादव को और मौजूदा जिला पंचायत अध्यक्ष पूनम यादव को कुर्सी दिलाने में अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई। बसपा इसे अपना श्रेय जरूर माने लेकिन डीपी के परिवार और रिश्तेदारों की बदायूं में बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि कुर्सी मिलने में डीपी का अपरोक्ष हाथ माना जाता रहा है। जिला पंचायत अध्यक्ष पूनम यादव उनकी सलहज हैं।
डीपी पर 10 दिन में दो बार लगी थी रासुका
बदायूं। बाहुवली डीपी यादव पर बदायूं में 10 दिन के भीतर जिला प्रशासन ने दो बार राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) की कार्रवाई की थी। पूर्व मंत्री, सांसद और विधायक डीपी यादव बदायूं की जिला जेल में 73 दिन रहे थे। 2004 में डीपी के खिलाफ गुन्नौर में दो, रजपुरा और सिविल लाइंस में एक-एक मुकदमा दर्ज हुआ था। 11 मई 2004 को डीपी यादव को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। तत्कालीन डीएम ने बाहुवली के खिलाफ 13 मई को रासुका की कार्रवाई की। 22 मई को शासन ने रासुका की कार्रवाई को निरस्त कर दिया। 23 मई को प्रशासन ने फिर से इसके खिलाफ रासुका की कार्रवाई की। बाद में एडवाइजरी बोर्ड ने 23 जुलाई 04 को डीपी से रासुका हटा दी। रासुका खत्म होने के बाद 24 जुलाई को इसे जमानत पर जेल से रिहा कर दिया गया। 73 दिन तक डीपी यादव बदायूं जेल में रहा। डीपी के जेल में रहने के दौरान यहां कड़ी सुरक्षा रही थी।