बदायूं। करीब 115 साल में पहली बार रामलीला मेले के आयोजन पर कोरोना संकट के बादल मंडरा रहे हैं। मेले का आयोजन 10 अक्टूबर से शुरू होना है लेकिन अभी तैयारियां शुरू नहीं हो पाईं। शासन से किसी गाइड लाइन का इंतजार है।
श्रीरामलीला महोत्सव कमेटी से जुड़े लोगों की मानें तो करीब 70 साल से रामलीला का मंचन गांधी ग्राउंड में हो रहा है। यहां बिहार के दरभंगा से कलाकार बुलाए जाते हैं। इससे पहले दातागंज तिराहा पर विज्ञानानंद इंटर कॉलेज के सामने स्थित मैदान में आयोजन होता था। करीब 70 साल से गांधी ग्राउंड में रामलीला महोत्सव के दौरान सैकड़ों दुकानें भी लगती हैं। लोग यहां काफी खरीददारी करते हैं। इस बार पहला मौका है जब मंचन तो होगा लेकिन मेला नहीं लगेगा। कोरोना की मार से पस्त हुए दुकानदारों को मेला से काफी उम्मीदें थीं। अब वह भी पूरी होती नहीं दिख रहीं। शहर के अलावा जिले के उपनगरों में भी हर साल बड़े स्तर पर रामलीला महोत्सवों का आयोजन होता है। इससे हजारों लोगों को रोजगार भी मिलता है। महोत्सव कमेटी मेला आयोजन की अवधि को 40 से घटाकर 15 दिन करने पर भी विचार कर रही है, लेकिन इसके लिए भी अनुमति जरूरी है।
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लाखों का होता है कारोबार
शारदीय नवरात्र से पहले शुरू होकर दीपावली तक रामलीला का आयोजन करीब 40 दिन तक होता है। इस दौरान सैकड़ों लोगों को रोजगार मिलता है। मेला में लाखों रुपये का कारोबार भी होता है। अकेले गांधी ग्राउंड में आयोजित होने वाले महोत्सव में ही डेढ़ सौ से ज्यादा छोटी-बड़ी दुकानें लगती हैं। इसके अलावा झूले, खेल-तमाशे आदि भी आते हैं। ठेला और फड़ लगाने वाले छोटे दुकानदारों की भी मेला के दौरान अच्छी दुकानदारी होती है। रामलीला महोत्सव कमेटी के मंत्री अरविंद कांत का कहना है कि मेला का आयोजन न होने से इस तबके पर भी काफी असर पड़ेगा।
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दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान तक से आते हैं व्यापारी
रामलीला में हर साल यूपी के साथ पड़ोसी राज्य राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड से भी काफी संख्या में व्यापारी दुकानें लगाते हैं। यूपी के बरेली, मेरठ, अलीगढ़, आगरा, हाथरस, फिरोजाबाद, मुरादाबाद, रामपुर आदि जिलों से भी बड़ी संख्या में व्यापारी यहां पहुंचते हैं। दरअसल रामलीला के 40 दिन के आयोजन के बाद रूहेलखंड के मिनी कुंभ के नाम से प्रसिद्ध मेला ककोड़ा भी शुरू हो जाता है। रामलीला में दुकानें लगाने वाले काफी व्यापारी मेला ककोड़ा में भी दुकानें लगाते हैं। इस बार रामलीला महोत्सव में मेला का आयोजन न होने से काफी व्यापार प्रभावित होगा। इसका असर मेला ककोड़ा में होने वाले व्यापार पर भी देखने को मिलेगा।
रावण दहन की परंपरा सांकेतिक रूप से निभाने पर विचार
रामलीला महोत्सव कमेटी कई साल से रावण दहन कार्यक्रम भव्य बनाने का प्रयास कर रही है, जिसके चलते बीते वर्षों में 51 फुट ऊंचाई तक का रावण का पुतला बनवाया गया, लेकिन इस बार कोरोना काल के चलते कमेटी ने रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले बनाने के लिए ऑर्डर नहीं दिए हैं। इस बार दशहरा 25 अक्टूबर को है। दरअसल, मेला के आयोजन में काफी खर्च होता है। यह खर्च मेला में लगने वाली दुकानों से निकलता है। इस बार मेला में दुकानें नहीं लगने से खर्च निकालना भी मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में महोत्सव कमेटी पदाधिकारियों का कहना है कि इस बार रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले बनाने का ऑर्डर नहीं दिया गया, लेकिन सांकेतिक रूप से रावण दहन की परंपरा निभाने पर कमेटी विचार रही है।
आंवला के कारीगर बनाते हैं रावण, मेघनाद, कुंभकरण के पुतले
शहर के मोहल्ला कबूलपुरा के फिदरत उल्ला दशहरा पर रावण, मेघनाद और कुंभकरण का पुतला बनाया करते थे। फिदरत उल्ला के बाद इनके बेटों नौशाद और दिलशाद ने यह काम चालू किया। जीविकोपार्जन के अन्य साधन होने के बाद भी दोनों अपने पिता के पुतला बनाने के शौक को कई साल तक जिंदा रखे रहे। बाद में इन लोगों ने भी पुतला बनाना बंद कर दिए। नौशाद और दिलशाद अब अन्य कोई धंधा कर रहे हैं। करीब तीन साल से श्रीरामलीला महोत्सव कमेटी बरेली के आंवला कस्बे के कारीगर तालिब से पुतला बनवा रही है। दशहरा से 15 दिन पहले ही आंवला से कारीगरों को बुला लिया जाता है। कई दिन की मेहनत के बाद वह यहां रावण, मेघनाद और कुंभकरण की विशालकाय पुतले तैयार करते हैं।