बदायूं। चीन के साथ चल रही तनातनी के चलते अब देश में कच्चा माल महंगा होने से दवाओं के दाम बढ़ने लगे हैं। दवा व्यापारियों के अनुसार आने वाले दिनों में इसका और ज्यादा असर दवाओं पर दिखने लगेगा, क्योंकि अब तक अधिकतर कच्चा माल चीन की ओर से आ रहा था। अब चीन से माल आना बंद हो गया है। ऐसे में माना जा रहा है कि इससे दवाएं 10 से 12 फीसदी और ज्यादा महंगी हो सकती हैं। हालांकि तमाम दवाओं के दाम अभी भी 15 से 20 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। ऐसे में मरीजों पर महंगाई की मार पड़ रही है।
दवा कारोबारियों के अनुसार दवाओं की कीमतों पर फैसला नेशनल फर्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी यानी एनपीपीएल लेती है। कुछ दिन पहले ही एनपीपीएल की तरफ से दिसंबर तक हेपेरिन नाम की दवा के दाम बढ़ाने का फैसला लिया है। हार्टअटैक या स्ट्रोक के मरीजों को दी जाने वाली यह पहली दवा है, जिसकी कीमत देश में चल रही कोरोना आपदा के बीच बढ़ी हैं। कोविड के इलाज के प्रोटोकॉल के अनुसार गंभीर मरीजों को इसका इंजेक्शन देना पड़ता है। इस दवा की कीमत बढ़ने का कारण चीन से आने वाले कच्चे माल में रुकावट को बताया गया है। इसी तरह हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के एपीआई ( एक्टिव फार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट) की कीमत भी बढ़ गई है। पैरासिटामॉल का एपीआई जो 250 रुपये का था, वह अब 350 रुपये किलो मिल रहा है। दरअसल, दवा बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल भारत में चीन से ही आयात होता था। पहले तो कोरोना संकट की वजह से कच्चा माल के आयात पर असर पड़ा और अब सीमा विवाद के कारण एपीआई की सप्लाई में कमी आई है। मांग की तुलना में आपूर्ति कम होने की वजह से कच्चे माल के दाम ऊपर जाने लगे हैं। इसका असर दवा की खुदरा कीमतों पर भी पड़ रहा है।
चीन से 70 फीसदी दवाओं के लिए आता है एपीआई
हर दवा में दो घटक होते हैं, एक एक्टिव फार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट यानी एपीआई और दूसरा एक्साइपिएंट। एपीआई का काम बीमारी को खत्म करना होता है, जबकि एक्साइपिएंट एपीआई में मौजूद तत्व को शरीर के भीतर ले जाने का काम करता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार फॉर्म्यूलेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले पदार्थ को एपीआई कहते हैं। जानकारों के मुताबिक चीन में बड़े पैमाने पर एपीआई का उत्पादन करता है और उसने इसकी कीमत भी काफी कम रखी है। इससे चीन से एपीआई मंगाना सस्ता पड़ता है। वैसे तो भारत में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी फार्मा इंडस्ट्री है, लेकिन सिर्फ तैयार दवाओं की। दवाओं के कच्चे माल के लिए भारत पूरी तरह चीन पर निर्भर है।
मुश्किल दौर में आयातकों ने एपीआई पर मुनाफाखोरी शुरू कर बढ़ाए दाम
जानकारों के मुताबिक पिछले दिनों कोरोना की वजह से दवाओं के कच्चे माल की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई थी। चीन से दवाओं के लिए एपीआई आयात करने वाले बड़े आयातक गुजरात, महाराष्ट्र और दिल्ली में हैं। बताया जा रहा है कि आपदा के दौरान मुनाफा कमाने के लिए आयातकों ने पहले से मंगाए गए कच्चे माल पर भी जमाखोरी शुरू कर दी। इस बीच दवा निर्माता कंपनियों के बंद रहने से मार्केट में स्टॉक में मौजूद दवाएं भी खप गईं। अनलॉक होने के बाद दवाओं का उत्पादन शुरू हुआ तो कच्चे माल की समस्या आने लगी। अब प्रमुख आयातक पहले से स्टॉक किए गए कच्चे माल को ही 15 से 20 फीसदी ज्यादा कीमत पर कंपनियों को बेच रहे हैं। लाजमी है कि महंगा कच्चा माल लेने वाली कंपनियां भी अब दवाओं की कीमत बढ़ाएंगी।
जरूरी दवाओं के दाम बढ़ने से परेशानी
आजकल की जीवन शैली में बीपी, शुगर और हार्ट आदि के रोगी बढ़ गए हैं। ऐसे में इन दवाओं की जरूरत ज्यादा होती है। कुछ दवाओं पर गौर करें तो इनके दामों में चुपके से वृद्धि कर दी गई है। उदाहरण के तौर पर ब्लड प्रेशर में काम आने वाले एमलोप्रेस एटी के 15 गोलियों की स्ट्रिप के दाम लगभग छह माह पूर्व 110 रुपये थे जो अब 122 रुपये की बिक रही है। इसी प्रकार शुगर की दवा ग्लिमीप्रेक्स के दस गोलियों के पत्ते की कीमत पहले 52 रुपये थी जो अब 55 रुपये हो गई है। लिवर के इलाज के लिए काम आने वाली यूडी-हेप की 10 गोलियों का जो पत्ता पहले 248 रुपये का था उसके दाम 382 रुपये तक हो गए हैं।
क्या बोले दवा व्यापारी
कंपनी की तरफ से माल कम भेजा जा रहा है। इस वजह से जनपद में दवाओं की कमी होना शुरू हो गई है। ऐसे में इसके रेट पर भी काफी असर पड़ा है। वहीं अब जेनेरिक दवाओं के दामों में बढ़ोतरी हुई हैं।
रंजीत सिंह, दवा व्यापारी
-चीन से आने वाले कच्चे माल में कमी आने की वजह से अपने यहां पर दवाओं के दाम बढ़ गए हैं। इससे बाजार में असर देखने को मिल रहा है। हालात यह है कि एंटी बायोटिक दवाओं पर भी दाम बढ़ गए हैं।
हेमेंत सारस्वत, दवा व्यापारी