शिक्षक दिवस विशेष
गुरु जनों ने माना, बीते 30 वर्ष में आए शिक्षा में बड़े बदलाव
गुरुकुल और विद्यालय को शिक्षा का मंदिर कहा जाता था। आधुनिक युग में स्कूल, कॉलेज और इंस्टीट्यूट खुले तो परंपरागत स्कूल और गुरुकुल लुप्त होते गए। इसी वजह से गुरुजनों की जगह सर और मैडम ने ले ली। इसी के साथ गुरु-शिष्य कर पुरानी परंपरा लगभग लुप्त हो गई। यह अब पुराने दौर के गुरुजन भी मानने लगे हैं कि शिक्षा व्यवसाय बन चुकी है, जिससे रिश्ते कमजोर होने लगे हैं। यही वजह है कि केंद्र और राज्य सरकारों के करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हो पा रहा है।
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निस्वार्थ से व्यावसाय बनी शिक्षा
राजकीय डिग्री कॉलेज के राजनीति शास्त्र के प्रवक्ता डॉ. राकेश जायसवाल बताते हैं कि पहले शिक्षा गुरुकुल यानि गुरु अपने परिवार के रूप में शिक्षा देते थे, जिसमें केवल नि:स्वार्थ भाव से शिक्षा दी जाती है। 1990 के बाद से व्यवसायिक शिक्षा का दौरा शुरू हुआ, जो अब महज एक व्यवसाय बनकर रह गया है। इसी वजह से गुरु और शिष्य के रिश्ते का लोप हो गया है।
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आचरण और व्यवहार को निखारें शिक्षक
प्रधानचार्य सुनील मिश्र कहते हैं कि पहले शिक्षक सत्ता, समाज, परिवार एवं जनमानस में आदर्श एवं सम्मान का पात्र होता था, लेकिन अब शिक्षा का व्यवासायीकरण होने से शिक्षक सत्ता, नेता, दबंग, प्रबंध तंत्र, पूंजीपति और समाज में अपमान झेल रहा है। इसलिए शिक्षकों को प्राचीन काल का गौरव पाने के लिए अपने आचरण और व्यवहार को निखाने में पहल करने की जरूरत है।
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पहले सेवा भाव था अब हुआ व्यवसाय
राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त रिटायर्ड शिक्षक असरार अहमद का मानना है कि पहले का शिक्षक सेवाभाव से पढ़ाता था और आज का शिक्षक व्यावसाय भाव से पढ़ाता था। पढ़ाई में कमजोर होने वाले छात्रों को अधिक अंक और गरीब होने के बावजूद होशियार छात्रों की अनदेखी करने से गुरुओं का मान गिरा है। यही वजह कि अब शिष्य गुरू का सम्मान करने से कतराने लगे हैं।
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एसी क्लासरूम में घट रहा ज्ञानार्जन
समाज शास्त्र के रिटायर्ड प्रवक्ता डॉ. रियाजुद्दीन बताते हैं कि शिक्षा के व्यवसायीकरण होने से विलासिता बढ़ी है। पहले शिक्षक अपने उत्तरदायित्व के प्रति समर्पित था और भौतिकतवादी युग में क्लासरूम एसी बनाए जा रहे हैं। यही वजह है कि शिष्यों का ध्यान ज्ञानार्जन से हटने लगा है। यह वजह है कि गुरु-शिष्य परंपरा के नैतिक मूल्य ही बदल गए हैं।
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आज की शिक्षा पद्धति पहले से बेहतर
ब्लूमिंग डेल में कक्षा नौ के छात्र जतिन रस्तोगी का कहना है कि उनके मम्मी पापा बताते हैं कि उन लोगों को शिक्षा का इतना अच्छा माहौल नहीं मिला। आज की शिक्षा पद्धति पहले से बेहतर है। अब गुरु प्यार के साथ पढ़ाते हैं, जबकि पहले मारपीट कर पढ़ाई कराई जाती है। इससे शिक्षा में सुधार आया है।
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शिक्षक स्कूल के बजाय पढ़ा रहे ट्यूशन
केंद्रीय विद्यालय की कक्षा इंटरमीडिएट की छात्रा शिवी गौड़ का कहना है कि आज के शिक्षक स्कूल में पढ़ाने की बजाय ट्यूशन पढ़ाने में ज्यादा रुचि रखते हैं। इससे माता पिता पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है। चाहकर भी तमाम मां-बाप अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दे पाते हैं। पहले की शिक्षा पद्धति अच्छी थी।