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जनता कर्फ्यू का एक साल: हिम्मत और हौसला भी दे गया लॉकडाउन

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बदायूं। कोरोना संक्रमण को दस्तक दिए सोमवार को एक साल बीत गया। एक साल पहले 22 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री ने एक दिन के जनता कर्फ्यू का आह्वान किया था। पूरे देश के साथ बदायूं भी कोरोना के खिलाफ जंग में खड़ा हो गया। जिले में जनता कर्फ्यू अभूतपूर्व रहा। इसके बाद 24 मार्च को प्रधानमंत्री ने पहली बार संपूर्ण लॉकडाउन का आह्वान किया। लॉकडाउन में लोगों को तमाम दिक्कतें भी हुईं। महामारी ने जहां दर्द दिया है, वहीं हिम्मत और हौसले से जीने की सीख भी दी। अनुशासन भी सिखाया, हालांकि तमाम लोगों को कोरोना ने कभी न भरने वाले जख्म दिए।
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एक साल के बाद कोरोना की दूसरी लहर फिर से दस्तक दे रही है। हालांकि, इस दौरान वैक्सीन भी आ गई है, लेकिन बड़े कतरे के बाद भी लोग गाइडलाइन को नजरअंदाज कर रहे हैं। बदायूं में दो अप्रैल को पहली बार सहसवान तहसील के मदरसों और मस्जिदों में मिले तब्लीगी जमात के सात लोगों की छह अप्रैल को पॉजिटिव रिपोर्ट आई तो पूरे जिले में हड़कंप मच गया। इसके बाद एक-एक कर मरीजों की संख्या बढ़ती रही और वायरस ने महामारी का रूप ले लिया। लोग घरों में कैद होकर रह गए। ऑफिस, दुकानें, मॉल और शोरूम, सब बंद हो गए। जिले में चार जून को जगत ब्लॉक के गांव उनौला के युवक की कोरोना से मौत हुई। यह कोरोना से मौत का जिले में पहला मामला था। इसके बाद फिर मौतों का सिलसिला शुरू हो गया। दूसरी तरफ, कोरोना योद्धाओं ने जान जोखिम में डालकर मरीजों का इलाज शुरू किया। घरों को सैनिटाइज किया। कोरोना वॉरियर्स लोगों की मदद के लिए आगे आए।
जिले में कोरोना से गई 45 लोगों की जान
कोरोना संक्रमण ने हालांकि अप्रैल के पहले सप्ताह में ही दस्तक दे दी थी। चार जून को जिले में पहली मौत हुई। इसके बाद भी मौतों का सिलसिला जारी रहा। अब तक जिले में कोरोना से 45 लोगों की जान जा चुकी है। एक साल में करीब 46 हजार कोरोना पॉजिटिव केस सामने आ चुके हैं। अब कोरोना की दूसरी लहर में भी छिटपुट मामले सामने आ रहे हैं। वैक्सीनेशन हो रहा है लेकिन फिलहाल बुजुर्गों और बीमार लोगों पर फोकस है। निजी और स्वास्थ्य कर्मियों के साथ फ्रंटलाइन वर्कर के टीकाकरण के बाद अब 60 साल से ऊपर के लोगों का टीकाकरण किया जा रहा है।
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पुलिस का मानवीय और अमानवीय चेहरा भी सामने आया
लॉकडाउन के दौरान जहां पुलिस ने कई अच्छे काम किए तो कई बार उसका अमानवीय चेहरा भी सामने आया था। सिविल लाइंस थाने की नवादा चौकी पर तैनात एक सिपाही ने लॉकडाउन में मीलों पैदल चलकर घरों को लौट रहे प्रवासी मजदूरों को मुर्गा बनाकर चलाया था। यह वीडियो वायरल हुई तो पुलिस की काफी किरकिरी हुई। बाद में सिपाही के खिलाफ कार्रवाई की गई। हालांकि, लॉकडाउन के दौरान कई नई चीजें ईजाद हुईं। कारोबार चौपट हो गया, कुछ रियायत मिलने पर कई व्यापारियों ने होम डिलीवरी चालू कर दी। हालांकि, बाद में अनलॉक होने के साथ बाजारों के खुलने का समय भी निर्धारित कर दिया गया था।
कोरोना योद्धा संभाले रहे मोर्चा
महामारी की दस्तक और लॉकडाउन के बाद से ही कोरोना योद्धाओं ने मोर्चा संभाल लिया। सबसे पहले पुलिस को ही फ्रंट पर आना पड़ा। इसके बाद शासन की ओर से मिलीं गाइडलाइन के अनुसार अन्य विभागों के अधिकारी और कर्मचारी भी फ्रंट लाइन पर आए। स्वास्थ्य विभाग ने महामारी पर काबू पाने के लिए काफी अच्छा काम किया, लेकिन क्वारंटीन सेंटरों में अव्यवस्थाएं भी सुर्खियों में रहीं। गंदगी, खराब भोजन, मूलभूत सुविधाएं न होना सुर्खियां बनीं। कई स्थानों पर तो प्रवासी मजदूरों को खेतों में टेंट बनाकर क्वारंटीन होना पड़ा।
अब पहले जैसे हालात नहीं हैं। वैक्सीन आ चुकी है। पिछले वर्ष कोरोना महामारी देश के लिए ही नहीं पूरी दुनिया के लिए नई थी। किसी को पता नहीं था, कैसे अंकुश लगाना है। अब एक साल का अनुभव है। कोरोना को हराने वाले और इलाज करने वाले योद्धा हैं, लेकिन लापरवाही अब भी भारी पड़ सकती है। - डॉ. अमित रस्तोगी, डीआईओ/नोडल अधिकारी
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