कारगिल के युद्ध में एक जुलाई 1999 को दुश्मनों से मोर्चा लेते हुए 9 पैरा रेजीमेंट के लांस नायक हरिओम सिंह देश की रक्षा की खातिर शहीद हो गये थे । कारगिल युद्ध में शहीद होने वाले लांस नायक हरि ओमसिंह की बुधवार को 16वीं पुण्यतिथि है। शहादत के समय शासन-प्रशासन ने तमाम वायदे किए थे, लेकिन उनके गांव की हालत बदतर है। जिला प्रशासन ही नहीं जनप्रतिनिधियों ने उनके गांव के प्रति संवेदनहीनता और उदासीनता दिखाई है। उस समय किए गए वायदे भी माननीय भूल चुके हैं।
बिसौली तहसील के बगरैन कस्बे के नजदीक गांव इटउआ निवासी महिपाल सिंह के पुत्र हरिओम सिंह कारगिल युद्ध में पाक सैनिकों से मुकाबला करते हुए शहीद हो गये थे। देश की खातिर जान गंवाने वाले इस रणबांकुरे की अब जनप्रतिनिधियों को याद तक नहीं आती है। उनका समाधि स्थल उपेक्षित पड़ा है। उसकी बाउंड्री तक नहीं कराई गई है। बैठने को बेंच तक नहीं है। इटउआ को शहीद हरिओम सिंह का नाम तो दिया गया, लेकिन डेढ़ दशक से गांव में कोई भी विकास कार्य नहीं कराया गया है ।
गांव आने को सैदपुर-करेंगी मार्ग से मुडिया-इटउआ मार्ग में गहरे गड्ढे हैं। अब जर्जर मार्ग आवागमन लायक भी नहीं रहा है। शहीद के समाधि स्थल पर तत्कालीन बिनावर विधानसभा के विधायक रामसेवक सिंह की अध्यक्षता में प्रदेश के नेताओं, मंत्रियों द्वारा शिलान्यास के नाम पर रखे गए पत्थर लोगों को मुंह चिढ़ा रहे हैं।
बता दें कि उनकी प्रतिमा का अनावरण तत्कालीन श्रम राज्यमंत्री धर्मपाल सिंह ने 28 अगस्त 2000 में किया था। समाधि स्थल के उद्यान की सुरक्षा दीवार व मुडिया से इट्उआ तक हरिओम सिंह नगर मार्ग का शिलान्यास पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने 24 नवंबर 2001 में किया था। पूर्व शिक्षा मंत्री डा. नैपाल सिंह ने शहीद के परिजनों द्वारा दी गई भूमि पर इंटर कॉलेज की आधारशिला रखी थी। इंटर कॉलेज तो खुला नहीं, लेकिन वर्ष 2003 में पूर्व माध्यमिक विद्यालय जरूर खोल दिया गया। विद्यालय की चहारदीवारी भी टूटी है। शौचालय टूटे पडे़ हैं। गांव में विकास कार्य ठप हैं। शहीद के परिवार को नौकरी देने, अस्पताल, इंटर कॉलेज खुलवाने के वादे भुला दिए गए हैं। इस उपेक्षा से परिजन व क्षेत्रवासी आहत हैं।