गीत-गजलों के शहंशाह गोपाल दास नीरज बदायूंवासियों की यादों में बसे हैं। वह बदायूं में आयोजित हुए कवि सम्मेलनों में कई बार आए थे। यहां के लोग उनके गीतों को अक्सर गुनगुनाने लगते हैं। बदायूं की पहचान विदेशों तक पहुंचने वाले यहां के कवि डॉ. उर्मिलेश और गोपालदास नीरज के नजदीकी संबंध थे। उनके एक बुलावे पर गोपालदास नीरज दौड़े चले आते थे। गोपालदास की ये लाइनें-‘किसके रोने से कौन रुका है कभी यहां, जाने को ही सब आए हैं सब जाएंगे। चलने की तैयारी ही तो बस जीवन है, कुछ सुबह गए कुछ डेरा शाम उठाएंगे।’ कई लोगों को याद हैं।
क्या बोले कवि
गोपालदास नीरज के निधन से बदायूं के साहित्यकार स्तब्ध हैं। बदायूंवासियों को उन्हें सुनने का कई बार सौभाग्य प्राप्त हुआ। कवि/गीतकार डॉ. उर्मिलेश के निधन से पूर्व वह बदायूं महोत्सव या किसी अन्य कार्यक्रम में यहां जरूर आते थे।
-सोनरूपा विशाल, कवयित्री ---
बदायूं में गोपालदास नीरज, डॉ. ब्रजेंद्र अवस्थी और मेरे पिताजी डॉ. उर्मिलेश के बीच गहरी दोस्ती थी। पिताजी के जीवनकाल में बदायूं क्लब में आयोजित हुए हर कवि सम्मेलन में गोपालदास नीरज शामिल रहे थे। उन्हें बदायूं वाले कभी नहीं भूल पाएंगे
- अक्षत अशेष, कवि
गोपाल दास नीरज का निधन होने पर एक युग का अंत हो गया। वे गीत गजलों के शहंशाह थे। उनकी मौजूदगी में काव्य मंच समृद्ध और सुुशोभित हो जाता था। बड़ा कवि सम्मेलन कहीं भी हुआ हो, बदायूं वासियों को गोपालदास का इंतजार रहता था।
-डॉ. राम बहादुर व्यथित, कवि ---
गोपालदास नीरज जितने बड़े और विख्यात कवि थे। उतने ही बड़ी उनकी सरलता थी। यूं तो मंचों पर कई बार सुनने का मौका मिला, लेकिन व्यक्तिगत मुलाकात करने का चार बार सौभाग्य प्राप्त
हुआ। गोपालदास नीरज से अपनी किताबों का विमोचन कराने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ।
- डॉ. अशोक खुराना, साहित्यकार